Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२३२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

(अनुष्टुभ्)
आत्मभावान्करोत्यात्मा परभावान्सदा परः।
आत्मैव ह्यात्मनो भावाः परस्य पर एव ते।। ५६।।

[परं अहम् कुर्वे] परद्रव्यने हुं करुं छुं’ [इति महाहङ्काररूपं तमः] एवा परद्रव्यना कर्तृत्वना महा अहंकाररूप अज्ञानांधकार- [ननु उच्चकैः दुर्वारं] के जे अत्यंत दुर्निवार छे ते- [आसंसारतः एव धावति] अनादि संसारथी चाल्यो आवे छे. आचार्य कहे छे केः [अहो] अहो! [भूतार्थपरिग्रहेण] परमार्थनयनुं अर्थात् शुद्धद्रव्यार्थिक अभेद्रनयनुं ग्रहण करवाथी [यदि] जो [तत् एकवारं विलयं व्रजेत्] ते एक वार पण नाश पामे [तत्] तो [ज्ञानधनस्य आत्मनः] ज्ञानघन आत्माने [भूयः] फरी [बन्धनम् किं भवेत्] बंधन केम थाय? (जीव ज्ञानघन छे माटे यथार्थ ज्ञान थया पछी ज्ञान कयां जतुं रहे? न जाय. अने जो ज्ञान न जाय तो फरी अज्ञानथी बंध कयांथी थाय? कदी न थाय.)

भावार्थः– अहीं तात्पर्य एम छे के-अज्ञान तो अनादिनुं ज छे परंतु परमार्थनयना

ग्रहणथी, दर्शनमोहनो नाश थईने, एक वार यथार्थ ज्ञान थईने क्षायिक सम्यक्त्व ऊपजे तो फरी मिथ्यात्व न आवे. मिथ्यात्व नहि आवतां मिथ्यात्वनो बंध पण न थाय. अने मिथ्यात्व गया पछी संसारनुं बंधन कई रीते रहे? न ज रहे अर्थात् मोक्ष ज थाय एम जाणवुं. पप.

फरीने विशेषताथी कहे छेः-

श्लोकार्थः– [आत्मा] आत्मा तो [सदा] सदा [आत्मभावान्] पोताना भावोने [करोति] करे छे अने [परः] परद्रव्य [परभावान्] परना भावोने करे छे; [हि] कारण के [आत्मनः भावाः] पोताना भावो छे ते तो [आत्मा एव] पोते ज छे अने [परस्य ते] परना भावो छे ते [परः एव] पर ज छे (ए नियम छे.). प६.

* * *

समयसार गाथा ८६ः मथाळुं

हवे फरी पूछे छे के बे क्रियानो अनुभव करनार पुरुष मिथ्याद्रष्टि कई रीते छे? तेनुं समाधान करे छेः-

* गाथा ८६ः टीका उपरनुं प्रवचन *

‘निश्चयथी द्विक्रियावादीओ आत्माना परिणामने अने पुद्गलना परिणामने पोते करे छे एम माने छे तेथी तेओ मिथ्याद्रष्टि ज छे एवो सिद्धांत छे.’

आत्मा राग पण करे अने बोलवानी भाषानी क्रिया पण करे एम जे माने ते