Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२६२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

फरीने विशेषताथी कहे छेः- * कळश प६ः श्लोकार्थ उपरनुं प्रवचन * ‘आत्मा’ आत्मा तो ‘सदा’ सदा ‘आत्मभावान्’ पोताना भावोने ‘करोति’ करे छे अने ‘परः’ परद्रव्य ‘परभावान्’ परना भावोने करे छे; ‘हि’ कारण के ‘आत्मनः भावाः’ पोताना भावो छे ते तो ‘आत्मा एव’ पोते ज छे अने ‘परस्य ते’ परना भावो छे. ते ‘परः एव’ पर ज छे (ए नियम छे). आत्मा कां तो पोताना शुद्ध चैतन्यपरिणामने करे, कां तो पोताना अशुद्ध चैतन्यपरिणामने करे. कां तो पोताना सम्यग्दर्शन-ज्ञान परिणामने करे, कां तो मिथ्यात्वरागद्वेषना परिणामने करे; पण परद्रव्यना परिणामने कदीय न करे. पोताना भावने पोते करे अने परना भावने पर करे छे. ज्ञानावरणीय कर्मना आस्रवना छ कारण तत्त्वार्थसूत्रमां कह्यां छे. त्यां छ कारणरूप जे जीवना परिणाम तेनो कर्ता जीव छे पण ज्ञानावरणीय कर्मनी पर्यायनो कर्ता आत्मा नथी. षोडशकारण भावनाना परिणामनो कर्ता आत्मा छे पण तीर्थंकरप्रकृतिनो जे बंध थाय तेनो कर्ता आत्मा नथी. ज्ञानीने कर्ताबुद्धिथी शुभभाव थता नथी; पण परिणमन छे ते अपेक्षाए तेने कर्ता कहेवाय छे. शुभभाव करवा लायक छे एवी बुद्धि तो समकितीने उडी गई होय छे. तेथी परिणमननी अपेक्षाए ज्ञानी ते शुभभावनो कर्ता हो, पण तीर्थंकरनामकर्मनी प्रकृतिनो जे बंध थाय छे तेनो ते कर्ता नथी. अकर्मदशा हती ते पलटीने तीर्थंकरनाम-कर्मरूप दशा थई तेनो आत्मा कर्ता नथी; तेनो कर्ता कर्म-पुद्गल छे. दया, दान आदिना भाव थाय तेनुं ज्ञानीने परिणमन होय पण ते दयाना भाव वडे परनी दया पाळी शके छे एम नथी. परना परिणामने आत्मा करी शके एम छे ज नहि. परना भावनो कर्ता परद्रव्य छे. बोलवानी भाषानी जे पर्याय छे ते परनो भाव छे. ते ते परमाणु ते भावना कर्ता छे. बोलवाना रागरूप परिणाम थाय तेनो कर्ता आत्मा छे. रागनुं परिणमन थाय छे ते अपेक्षाए ज्ञानीने तेनो कर्ता कहेवामां आवे छे. पण ते राग करवा लायक छे एम ज्ञानी मानता नथी. रागना स्वामीत्वपणे ज्ञानी परिणमता नथी. परद्रव्यना कर्ताकर्मपणानी मान्यताने अज्ञान कहीने एम कह्युं छे के जे एवुं माने ते मिथ्याद्रष्टि छे. परनी सेवा करी शकुं छुं, बीजानुं दुःख टाळी शकुं छुं, बीजाने आहार-पाणी, कपडां इत्यादि दई शकुं छुं. आवुं माने ते मिथ्याद्रष्टि छे. क्षायिक समकिती होय एवा मुनिने पण राग आवे छे, परिणमननी अपेक्षाए ते एना कर्ता छे, पण ए करवा लायक छे एम ते मानता नथी. [प्रवचन नं. १४७ थी १प२ * दिनांक प-८-७६ थी १०-८-७६]