Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ८६ ] [ २६१

प्रतीति थई ते सम्यग्दर्शन धर्मनुं पहेलुं पगथियुं छे. साथे जे अनुभूति छे तेमां एनो ख्याल आवे छे.

अरे भाई! शुभभावनो तने केम आटलो प्रेम छे? शुभभाव तो अभविने पण थाय छे. निगोदना जीवने पण शुभभाव थता होय छे. शुभभाव ए तो कर्मना संगे थतो विकार छे. लसणनी एक बारीक कटकीमां असंख्य औदारिक शरीर होय छे. अने ते दरेकमां अनंत निगोदिया जीव होय छे. ते दरेक जीवने क्षणे शुभ क्षणे अशुभ एवा भाव थया करे छे. माटे शुभभाव ए कोई नवी अपूर्व चीज नथी. नियमसारमां (श्लोक १२१मां) आवे छे के कथनमात्र एवा व्यवहाररत्नत्रयना परिणामने भवसागरमां डूबेला जीवे अनंतवार कर्या छे. अरे भाई! भवना भाव उपरथी द्रष्टि खसेडीने गुलांट खा. श्रद्धानी पर्याय शुद्ध चैतन्यमय वस्तुमां अंदर जाय ते अपूर्व चीज छे. पलटो खाईने तुं अंतरमां-वस्तुमां ढळी जा. तेथी तने अलौकिक अनुभव सहित सम्यग्दर्शन थशे. आ रागनी मंदता अने परलक्षी जाणपणुं ए कोई चीज नथी. परमार्थनयना ग्रहणथी मिथ्यात्वनो नाश थाय ए मुदनी चीज छे.

भगवान आत्मा शुद्धचैतन्यमय वस्तुमां झुकाव करवाथी जे भूतार्थनो अनुभव थयो ते अनुभवथी मिथ्यात्वनो नाश थाय छे, कषायनी मंदताथी मिथ्यात्वनो नाश थतो नथी. कषायनी मंदता होय तो अनंतानुबंधी अने दर्शनमोहनो रस थोडो पडे छे. पण ए कांई चीज नथी. राग मंद थाय ते कांई वस्तु नथी, केमके शुभना काळमां मिथ्यात्वनो रस मंद हो पण एनाथी कांई मिथ्यात्वनो नाश थतो नथी. आवी ज वस्तुस्थिति छे अने ते अनंत तीर्थंकरोए एम ज जाणी छे अने कही छे.

अहीं आचार्यदेव कहे छे के एकवार अनुभव थयो पछी बंधन केम थाय? स्वरूपनी सावधानीमां अनुभवना काळे दर्शनमोहनो नाश थाय छे. त्यां प्रथम उपशम समकित थईने क्षयोपशम समकित थाय छे. ते क्षयोपशम पण पडवानुं नथी एम कहे छे. द्रव्यनो अभाव थाय तो क्षयोपशम समकित पडी जाय एम जोरदार वात करी छे. मिथ्यात्व गया पछी रागथी अल्पबंधन थाय ते अहीं गणतरीमां नथी, केमके जे भावथी अनंत संसार वधे ते भावने संसार अने बंधन (मुख्यपणे) कहेवामां आव्युं छे.

एकवार ज्ञान थईने क्षायिक समकित ऊपजे तो फरी मिथ्यात्व न आवे. मिथ्यात्व नहि आवतां मिथ्यात्वनो बंध पण न थाय. अने मिथ्यात्व गया पछी संसारनुं बंधन कई रीते रहे? न ज रहे अर्थात् मोक्ष ज थाय एम जाणवुं. मिथ्यात्व छे ए ज आस्रव-बंध छे. शक्तिरूप स्वभावनो-मोक्षस्वरूप स्वभावनो अनुभव थयो तेने व्यक्तिरूप मोक्ष थशे ज थशे, पडवानी वात ज नथी.