Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२६० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

* कळश पपः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘अहीं तात्पर्य एम छे के-अज्ञान तो अनादिनुं ज छे. परंतु परमार्थनयना ग्रहणथी, दर्शनमोहनो नाश थईने, एकवार यथार्थ ज्ञान थईने क्षायिक सम्यक्त्व ऊपजे तो फरी मिथ्यात्व न आवे. मिथ्यात्व नहि आवतां मिथ्यात्वनो बंध पण न थाय. अने मिथ्यात्व गया पछी संसारनुं बंधन कई रीते रहे? न ज रहे अर्थात् मोक्ष ज थाय एम जाणवुं.’

पोताना त्रिकाळी स्वभावने भूलीने राग अने परवस्तु मारां छे अने हुं तेनो कर्ता छुं एवुं मोहरूपी अज्ञान अनादिनुं छे. आम तो अज्ञान एक एक समयनुं छे. बीजा समये बीजुं, त्रीजा समये त्रीजुं एम परंपराथी प्रवाहरूपे अज्ञान अनादिनुं छे. अज्ञाननी पर्यायनो प्रवाह अनादिथी छे तेथी अज्ञान अनादिनुं कह्युं छे. एवी पर्यायने ग्रहण करवी ते पर्यायबुद्धि छे. आ पर्यायबुद्धिनो त्याग करीने त्रिकाळी शुद्ध आत्मद्रव्यनुं ग्रहण करवुं ते जैनधर्म छे. जैनधर्म छे ते पर्याय छे पण तेनी द्रष्टि द्रव्य उपर छे-अने तेने परमार्थनयनुं ग्रहण कहे छे. अहीं भावार्थमां परमार्थनयनुं ग्रहण एम एक ज शब्द लीधो छे. टीकामां भूतार्थ, परमार्थ, शुद्ध द्रव्यार्थिक नय अने अभेदनयनुं ग्रहण एम चार शब्द लीधा हता. ते बधानो एक ज अर्थ छे. अहाहा...! वस्तु त्रिकाळी शुद्ध चैतन्यस्वभावमय छती मोजूदगीवाळी चीज महाप्रभु छे. तेने जेवी छे तेवी ज्ञान अने श्रद्धानमां लईने अनुभव करतां मिथ्यात्वनो नाश थई सम्यक्त्व उपजे छे.

ज्ञाननो स्वभाव ज स्वपरप्रकाशक छे. तेथी अज्ञानीने पण ज्ञाननी पर्यायमां स्व एटले पोतानो आत्मा सदा जाणवामां आवे ज छे. परंतु तेनी द्रष्टि स्व उपर जती नथी. तेनी द्रष्टि राग अने पर्याय उपर ज रहे छे. तेथी पोताने पोते जणातो होवा छतां द्रष्टि अन्यत्र रहेती होवाथी अज्ञानी हुं आ (आत्मा) छुं एम मानतो नथी. तेने कहे छे-भाई! तारी महत्ता अपरंपार छे. त्रणलोकनो नाथ अनंतगुणनी समृद्धिथी भरेलो तुं चिदानंद भगवान छे. तारी द्रष्टि तुं त्यां स्थाप. तेथी मिथ्यात्वनो नाश थईने तने सम्यग्दर्शन थशे अने पछी फरीथी मिथ्यात्व नहि थाय. राग अने पर्याय परथी द्रष्टि हठावीने तारी चैतन्यमय त्रिकाळी चीज प्रति द्रष्टि कर.

श्रद्धानी पर्याय जाणती नथी. जाणे छे तो ज्ञाननी पर्याय. श्रद्धानी पर्याय स्व तरफ झुकवाथी द्रव्यनी श्रद्धा थाय छे. श्रद्धानी पर्याय अनादिथी पर तरफ-राग अने निमित्त तरफ झुकेली छे. ते श्रद्धानी पर्याय त्रिकाळी शुद्ध द्रव्य तरफ झुके तो द्रव्य ज तेनी श्रद्धामां आवे छे अने तेनुं ज नाम धर्म छे. श्रद्धामां आ द्रव्य छे एवुं ज्ञान नथी. श्रद्धानी पर्याय अंतर्मुख वळी त्यां आ आत्मा ते ज हुं एम भगवान आत्मानी