समयसार गाथा ८६ ] [ २प९
छे. आचार्यदेव छे तो छद्मस्थदशामां पण जोरदार वात करी छे. आ पंचम आराना मुनिनुं कथन छे. अमृतचंद्रदेवे हजार वर्ष पहेलां आ वात करी छे. आत्माने पंचम आराथी शुं संबंध छे? बहु ऊंची वात करी छे. एक तो भूतार्थना परिग्रहनी वात करी अने बीजी वात ए करी के एकवार मिथ्यात्वनो नाश थाय पछी मोह फरीथी उत्पन्न नहि थाय, फरी बंधन नहि थाय. चारित्रना दोषनो थोडो बंध छे पण ते मुख्य नथी. अल्प स्थिति-रस पडे छे तेने बंध गणवामां आव्यो नथी.
प्रभु! तुं जेमां उदयभावनो प्रवेश नथी एवो ज्ञानघन आत्मा छो. एनुं एकवार यथार्थ ज्ञान थया पछी ज्ञान कयां जतुं रहे? न जाय. अने जो ज्ञान न जाय तो फरी अज्ञानथी बंध कयांथी थाय? कदी न थाय. अहाहा...! अप्रतिहत क्षयोपशम समकित छे ते क्षायिक समकित साथे जोडाई जशे. अहीं पडवानी वात करी नथी. जे चडया ते पडे केवी रीते? भगवान चिदानंद पर आरूढ थया ते केम पडे? अरे! आ तो वीरोनो वीरपंथ छे. कायरनां अहीं काम नथी. कोई पडी जाय तो? अरे! अहीं पडवानी कयां मांडी?
मीराबाईना नाटकमां वैराग्यनुं द्रश्य आवे छे. राणो कहे छे के मीरां! तुं मारा राज्यमां आव, तने पट्टराणी बनावुं. त्यारे जवाबमां मीरां कहे छे-
अहा! आवुं द्रश्य जोईने वैराग्यनी धून चढी जती. एम धर्मी जीव कहे छे के-
अमे भगवान आत्मानी प्रतीति करी छे, हवे अमारे बीजानो प्रेम न होय.
सीताजीनुं अपहरण करीने रावण लंकामां लई गयो. पछी त्यां बगीचामां सीताजीने मनाववा जाय छे. त्यारे सीताजी रावणने कहे छे-रामचंद्र सिवाय स्वप्ने पण अमने बीजो पति न होय. रावण! दूर उभो रहेजे; नहितर सतीना मुखमांथी नीकळेलां वचन तने भस्म करी देशे. हुं तो पतिव्रता स्त्री छुं. बीजानुं लक्ष अमने स्वप्ने पण न होय. एम अहीं धर्मी कहे छे के अमने एकवार भेदज्ञान थयुं छे. हवे अमे पडवाना नथी. फरीने अमने बंध नहि थाय. अहाहा...! जगतने उपदेश आपता आचार्यदेव केटला जोरथी वात करे छे!
एकवार सम्यग्ज्ञान प्रगट थया पछी अज्ञान केम आवे? अने फरी बंध कयांथी थाय? कदी न थाय.