Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२प८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

क्रियाकांडना विकल्प करे, मुनिपणुं बहारथी ले, पण भूतार्थना अनुभव विना समकित नहि थाय अने समकित विना धर्मनी शरूआत नहि थाय.

दिगंबरमां देव-गुरु-शास्त्र सत्य छे. छतां दिगंबरोने सत्य वस्तुनी खबर नथी. अहीं कहे छे के सर्व विकल्पोने छोडी दे अने त्रिकाळ सच्चिदानंद भगवान आत्मानो एकवार अनुभव कर. अरे भाई! एटलो निर्णय तो प्रथम कर के निर्मळानंदनो नाथ त्रिकाळी शुद्ध चिदानंद प्रभु अंदर बिराजे छे तेना अनुभवथी सम्यग्दर्शन थाय छे. ए सिवाय बहारथी देव-गुरु-शास्त्रनी श्रद्धा करवी के नवतत्त्वना भेदनी श्रद्धा करवी ते सम्यग्दर्शन नथी.

कळशटीकामां छठ्ठा कळशमां कह्युं छे केइमाम् नवतत्त्वसन्ततिम् मुक्त्वाजीव- अजीव-आस्रव-बंध-संवर-निर्जरा-मोक्ष-पुण्य-पापना अनादि संबंधने छोडीने जीव पोताना स्वरूपनो अनुभवनशील थाओ. भावार्थ आम छे-संसार अवस्थामां जीवद्रव्य नवतत्त्वरूप परिणम्युं छे ते तो विभावपरिणति छे, तेथी नवतत्त्वरूप वस्तुनो अनुभव मिथ्यात्व छे. नवतत्त्वना भेदवाळी द्रष्टि ए मिथ्यात्व छे.

‘तत्त्वार्थश्रद्धानम् सम्यग्दर्शनम्’–सूत्रमां एकवचन छे. त्यां अभेदनी वात छे. भूतार्थनुं ग्रहण करवाथी नवतत्त्वनी पर्यायनुं ज्ञान यथार्थ थाय छे. अथवा भूतार्थनी श्रद्धा करवाथी आ त्रिकाळी चीज ते भूतार्थ छे अने संवर आदि नवतत्त्व छे ते एमां नथी एवुं यथार्थ ज्ञान-श्रद्धान थाय छे अने ते सम्यग्दर्शन छे.

अहो! भूतार्थ एटले परमार्थनयनुं अर्थात् शुद्धद्रव्यार्थिक अभेदनयनुं ग्रहण करवाथी जो ते (अज्ञान) एक वार पण नाश पामे तो ज्ञानघन आत्माने फरी बंधन केम थाय? एकवार पण स्वसन्मुखपणे अंतर्द्रष्टि थई पछी तेनो नाश थतो नथी. द्रव्यनो नाश थाय तो द्रष्टिनी पर्यायनो नाश थाय. पण द्रव्य तो त्रिकाळ ज्ञानघन सदा मोजुद छे. तेथी अनुभवनी द्रष्टिनो नाश थतो नथी. केटली जोरदार द्रढताथी वात करी छे. (सम्यग्दर्शन) पडी जाय ए वात अहीं लीधी नथी. आ तो वीरनी वातो छे. त्यां कायरनुं काम नथी. कह्युं छे ने के-

जे मार्गे सिंह संचर्या, तरण लागी रज,
ए ऊभा खड सूकशे, नहि चरशे हरण.

समकिती सिंह जे मार्गे विचर्या अने तेनी जे वाणी आवी ते, आ एकांत छे एवां भय अने शंका जेने लागे ते कायर नहि स्वीकारे. बापु! आ वीतरागनी वाणी सांभळवा मळे ए महाभाग्य होय तो मळे छे अने धीर-वीरने ते पचे छे.

अहीं कहे छे-भूतार्थनो अनुभव करतां एक वार मिथ्यात्वनो नाश थाय तो ज्ञानघन आत्माने फरीथी बंध केम थई शके? आवी आ अप्रतिहत सम्यग्दर्शननी वात