समयसार गाथा ८६ ] [ २प७
वार लगनी लगाड; तने तत्त्वनी उपलब्धि थशे. उपलब्धि न थाय एवी तारी वस्तु नथी. छ मास लगातार प्रयत्न कर. जेम मातानी आंगळीथी नानुं बाळक छूटुं पडी जाय अने तेने कोई पूछे के-तारुं नाम शुं? तारुं घर कयुं? तारी शेरी कई? तो बाळक कहे के ‘मारी बा’. माताना विरहे बाळक पण एक बानुं ज चिंतवन करे छे. तेम प्रभु! तने अनंतकाळथी आत्मानो विरह छे. अने आत्मा आत्मा एम चिंतवन न थाय अने एनी समीप तुं न जाय तो आ जीवन व्यर्थ चाल्युं जशे. भाई! सघळां काम छोडीने आ करवा जेवुं छे. स्तुति, वंदना वगेरे बहारनी क्रियाना विकल्पोने तो विषरूप कह्या छे, केमके भगवान अमृतस्वरूप आत्माथी ते विरुद्ध भाव छे. तो ए झेरने छोडी तारी चीजमां ज्यां एकलुं अमृत भर्युं छे त्यां जा, त्यां जा.
शास्त्रमां आवे छे के-जेना दर्शन अने ज्ञानमां आत्मा समीप छे अने राग दूर छे ते ज्ञानी छे. अज्ञानीने राग समीप छे अने आत्मा दूर छे. परमात्मप्रकाश दोहा ३६मां आवे छे के जेने रागनी रुचि छे तेवा अज्ञानीने आत्मा हेय छे अने ज्ञानीने राग हेय छे अने त्रिकाळी शुद्ध भूतार्थ वस्तु उपादेय छे. अरे भगवान! तारी बलिहारी छे, पण तारी तने खबर नथी. आ बहारनी लक्ष्मी, आबरू, विषय, वासना, वगेरे भाव तो पापभाव छे. अने पठन, पाठन, स्तुति, भक्ति वगेरे जे शुभभाव आवे तेने पण भगवान झेर कहे छे. ए झेरथी अमृतनी-आत्मानी प्राप्ति नहि थाय. भगवाननो आ मार्ग छे; लोकोए तेने बगाडी नाख्यो छे. कळश १८९मां कह्युं छे के-‘विषं एत प्रणीतं’–शुभक्रियारूप विकल्पो विष छे. अंदर आनंदनो कंद भगवान आत्मा बिराजे छे ते एकनो ज अनुभव अमृत छे अने ते ज सम्यग्दर्शन छे, धर्म छे. आठ वर्षनी बालिका पण सम्यग्दर्शन पामे छे ते अंदर एक भूतार्थ भगवान आत्मानो अनुभव करीने सम्यग्दर्शन पामे छे. आ ज रीत छे.
मेरु पर्वतथी उपर प्रथम स्वर्ग सौधर्म देवलोक छे. तेमां बत्रीस लाख विमान छे. एक विमानमां असंख्य देव छे. ते स्वर्गनो स्वामी शक्र-इन्द्र एक भव करीने मोक्ष जवानो छे. ते हवे पछी मनुष्यनो देह पामी केवळज्ञान प्रगट करी मोक्षपद पामशे. तेनी स्त्री इन्द्राणी-शची छे. ते जन्मी त्यारे मिथ्याद्रष्टि हती केमके समकित होय तो स्त्री पर्यायमां जन्मे नहि. उपजे त्यारे मिथ्यात्वसहित होय छे, पछी समकितने प्राप्त थाय छे. ते इन्द्राणी पण एक भव करीने मोक्ष पामशे. अन्य संप्रदायमां मल्लिनाथने स्त्री पर्याय ठरावी छे ते जूठुं छे. स्त्री पर्यायमां मोक्ष माने ते बधुं कल्पित छे. अहा! संप्रदायमांथी नीकळवुं लोकोने कठण पडे अने तेमांथी नीकळे तो शुभभावमांथी नीकळवुं कठण पडे. अहीं तो कहे छे के-भूतार्थ शुद्ध चिद्रूप एकरूप वस्तुनुं एकवार ग्रहण कर. भाई! त्रिकाळी शुद्ध ध्रुव वस्तुना अनुभव विना सम्यग्दर्शन नहि थाय. लाख