२प६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
अनुभव रही गयो छे. गाथा १७-१८मां आवे छे के भगवान आत्मा एक समयमां पूर्णानंद प्रभु बाळगोपाळ सर्वमां बिराजे छे. बाळगोपाळ तो देहनी अवस्था छे, पण अंदर ज्ञायक प्रभु त्रिकाळ छती चीज बिराजे छे. ते ज्ञाननी स्वपरप्रकाशक पर्यायमां जाणवामां आवे छे. पण अज्ञानीनी त्यां द्रष्टि नथी तेथी ते पोताने मानतो नथी, तेने अनादिथी रागनुं ज, शुभाशुभभावनुं परिग्रहण छे. अहीं कहे छे के भाई! रागनुं ग्रहण तो अनंतवार कर्युं, पण ए तो अभूतार्थ चीज छे. भगवान आत्मा ज एक भूतार्थ छे. ए भूतार्थना परिग्रहथी- आश्रयथी सम्यग्दर्शन थाय छे.
चोथी गाथामां कह्युं छे के-रागनी कथा, बंधननी कथा तो अनंतवार सांभळी छे, एनो परिचय अने एनो अनुभव पण अनादि संसारथी चाल्यो आवे छे. अहीं कहे छे के भगवान! एक वार गुलांट खा. प्रभु! एक वार पलटो खा. भूतार्थने पकडीने भूतार्थनो अनुभव कर. ज्ञाननी पर्यायमां भूतार्थनो अनुभव करवो ते सम्यग्दर्शन छे, अने ते भूतार्थनय छे. अरे भाई! आ मनुष्यपणुं मळ्युं अने भगवान आत्मानो पाको निर्णय अने अनुभव न कर्यो तो जिंदगी एम ने एम व्यर्थ चाली जशे. जेवी पोतानी चीज छे तेने अनुसरीने तेनो अनुभव करवो ए ज करवा योग्य छे.
कोई कहे छे के दिगंबर छे तेने समकित तो छे, भेदज्ञान तो छे. हवे व्रत धारण करे तो चारित्र थई जाय. एम न होय प्रभु! लोकोने निश्चय समकितनी खबर नथी अने बहारनी तत्त्वार्थ-श्रद्धा, व्यवहार-श्रद्धाना रागने धर्म माने छे. पण मार्ग एम नथी, भाई! ऊंधुं मानवामां तो आत्मानी छेतरपींडी छे. पूर्णानंदना नाथ भगवान आत्मानो ज्यां अनुभव नथी त्यां जे क्रियाकांड छे ते बधो अज्ञानभाव छे, संसारभाव छे. बहारथी उपवासादि करे पण ए बधां बाळतप छे. आवी क्रिया तो अनंतकाळमां जीवे अनंतवार करी, पण मिथ्यात्व टळ्युं नहि तो शुं कर्युं? आवी वात आकरी लागे पण शुं थाय? आचार्यदेव कहे छे के एकवार भूतार्थ पदार्थ तारी परमार्थ त्रिकाळी ध्रुव वस्तुनो अनुभव कर.
कळशटीकामां आवे छे के पठनपाठन, पंचपरमेष्ठीनुं स्मरण, चिंतन, स्तुति इत्यादि बधुं तो जीवे अनंतवार कर्युं छे. लोकोने बिचाराओने अभ्यास नहि; उपरथी थोडुं सांभळी ले, निर्णय करे नहि अने अहोनिश वेपारधंधा इत्यादि अशुभमां व्यर्थ समय गाळे. पण भाई! तुं कयां जईश ए विचारतो नथी! त्यां रळवा माटे जेटलो प्रयत्न करे छे तेथी अधिक आ समजवा माटे प्रयत्न करवो जोईए. अन्यथा माथे अनंत संसारनी डांग ऊभेली ज छे.
जो गुलांट खाय तो एक क्षणमां भूतार्थना आश्रये सम्यग्दर्शन प्रगट थाय छे. आचार्य अमृतचंद्रस्वामीए (कळश ३४मां) कह्युं छे के-छ मास अभ्यास कर. एक-