Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 1027 of 4199

 

समयसार गाथा ८६ ] [ २पप

भूतार्थ नाम त्रिकाळी ध्रुव ज्ञायकभावरूप शुद्ध चैतन्यमय वस्तु. अहाहा! तेनो समस्त प्रकारे एकवार अनुभव करे तो मिथ्यात्वनो नाश थई जाय छे. समयसारनी ११मी गाथा जैनशासननो प्राण छे. त्यां पण एम कह्युं छे के ‘भूदत्थमस्सिदो खलु सम्मादिट्ठी हवदि जीवो’–भूतार्थ नाम त्रिकाळी शुद्ध ज्ञायकवस्तुनो आश्रय करवाथी निश्चय सम्यग्दर्शन थाय छे. अहाहा...! एक समयमां पूर्णानंदनो नाथ भगवान स्वयंज्योति सुखधाम अंदर पर्याय विनानी पोतानी चीज पडेली छे. तेनो आश्रय करे त्यारे पर्यायमां तेनो अनुभव थाय छे ते सम्यग्दर्शन छे. ते धर्मनुं प्रथम पगथियुं छे. आ सिवाय बीजा बधा क्रियाना विकल्पो फोक छे, निरर्थक छे.

‘भूतार्थपरिग्रहेण’-आने माटे परमार्थनय शब्द कह्यो छे. भूतार्थ नाम परमार्थनय. परमार्थ एटले-परा कहेतां उत्कृष्ट, मा एटले लक्ष्मी एवो जे अर्थ एटले पदार्थ. अहाहा...! भूतार्थ एटले त्रिकाळी छतो पदार्थ जे भगवान आत्मा तेने अहीं उत्कृष्ट लक्ष्मीवंत पदार्थ एटले परमार्थ कह्यो छे. लौकिकमां तो परनुं कांईक करे तेने परमार्थ कहे छे. अहीं तो परनुं करे एने तो अज्ञान कह्युं छे. हुं दान आपुं, हुं आहार आपुं, हुं कपडां आपुं, हुं बीजाने सुखी करुं एवो परनी क्रिया करवानो भाव छे ते अहंकार छे अने ते मिथ्यात्व छे, परमार्थ नथी. उत्कृष्ट लक्ष्मीवंत ज्ञानानंदस्वभावी भगवान आत्मा परमार्थ छे, भूतार्थ छे.

भगवान त्रिलोकनाथ भूतार्थ पदार्थ छे. प्रभु! आ अलौकिक चीज छे! एक समयमां भूतार्थ-छती चीज, पलटाती पर्याय विनानी चीज एवी त्रिकाळी एकरूप चीज तेने अहीं भूतार्थ कही छे. अहीं भूतार्थपरिग्रहेण-एम जे कह्युं छे एना माटे चार शब्द कह्या छे. भूतार्थ एक, परमार्थनय बे, शुद्ध द्रव्यना अनुभवनुं जेमां प्रयोजन छे ते शुद्ध द्रव्यार्थिकनय त्रण अने अभेदनय चार. अहाहा! अभेद एकरूप त्रिकाळी नित्यानंद ज्ञानानंदस्वरूप प्रभु सद्रशस्वभाव जे प्रत्येक पर्यायमां अन्वयरूप रहे ते सदा एकरूप चीजने अहीं अभेदनय कहेल छे. पर्यायबुद्धि छोडीने त्रिकाळी छता पदार्थनो अनुभव करवानुं अहीं कहेलुं छे, केमके परमार्थरूप भूतार्थनो अनुभव करवाथी सम्यग्दर्शन थाय छे, अरे भाई! पांच परावर्तनरूप संसारमां शुभाशुभभावरूप परावर्तन तुं अनंतवार करी चूकयो छे. शुभभाव तो तुं अनादि संसारथी करतो आव्यो छुं अने में शुभभाव कर्या एवा अहंकाररूपे ज तुं परिणम्यो छुं. भगवान! अंदर पंचपरावर्तनना भावथी भिन्न तारी चीज शुद्ध ज्ञायकभावे पडी छे तेनो आश्रय कर. केमके ते वडे सम्यग्दर्शन थाय छे.

भगवाननो मार्ग अति सुक्ष्म छे. लोको तो बाह्य शुभभावमां अने परद्रव्यनी क्रियामां अनादिकाळथी अहंपणुं करी रह्या छे. पोतानी जे त्रिकाळी शुद्ध वस्तु ‘अहम्’ ते बाजु पर रही गई छे. त्रिकाळी शुद्ध भगवान आत्मा ते ‘अहम्’–हुं एवो