२प४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
आवो मार्ग श्री सीमंधर भगवाने धर्मसभामां कह्यो छे अने ते ज मार्ग श्री कुंदकुंदाचार्य अहीं लाव्या छे. अज्ञानी माने के ‘परं अहं कुर्वे’ पर द्रव्यने हुं करुं छुं. पण परद्रव्यने कोण करे? परद्रव्यनो अर्थ अहीं परद्रव्यनी पर्याय करवो. अहाहा...! आ शरीर, मन, वाणी, इन्द्रिय, कर्म इत्यादि परद्रव्यनी क्रियाने हुं करुं छुं एम जे माने छे ते अहंकारी, अज्ञानी, मिथ्याद्रष्टि छे. हुं बीजाओने सुंदर वक्तव्य-व्याख्यान वडे समजावी दउं एम अज्ञानी माने छे. बीजाने कोण समजावी दे? अरे भाई! भाषा तो जड छे. ते जडना पोताना कारणे थाय छे. जीभ, होठ आदि हले ते पोताना कारणे हले छे, ते आत्माना विकल्पने कारणे हले छे एम नथी. भाषा जे शब्दनो विकार छे ते तो पोताना कारणे पोते भाषारूप थाय छे. अने समजनार पण पोते पोतानी योग्यताथी पोताना कारणे समजे छे. आवुं ज वस्तुस्वरूप छे. आ मोटां कारखानां चाले ते समये ते ते पुद्गलोनी जे पर्याय थवा योग्य होय ते पुद्गलोथी थाय छे. त्यां बीजो कोई (उद्योगपति आदि) एम कहे के माराथी कारखानां चाले छे तो ते परद्रव्यना कर्तापणाना अहंकाररसथी भरेलो अज्ञानी मिथ्याद्रष्टि छे.
अहा! जगतमां मोही अज्ञानी जीवोने परद्रव्यना कर्तापणानो महा अहंकार छे अने ते अज्ञान छे. आवुं अज्ञान तेमने अनादि संसारथी चाल्युं आवे छे अने ते दुर्निवार छे, टाळवुं महा कठण छे. आ अज्ञान महा पुरुषार्थ वडे ज टाळी शकाय एम छे.
हवे कहे छे-‘अहो’ अहो! ‘भूतार्थपरिग्रहेण’ परमार्थनयनुं अर्थात् शुद्ध द्रव्यार्थिक अभेदनयनुं ग्रहण करवाथी ‘यदि’ जो ‘तत् एकवारं विलयं व्रजेत्’ ते एक वार पण नाश पामे ‘तत्’ तो ‘ज्ञानघनस्य आत्मनः’ ज्ञानघन आत्माने ‘भूयः’ फरीथी ‘बन्धनम् किं भवेत्’ बंधन केम थाय? जीव ज्ञानघन छे माटे यथार्थ ज्ञान थया पछी ज्ञान कयां जतुं रहे? न जाय. अने ते ज्ञान न जाय तो फरी अज्ञानथी बंध कयांथी थाय? कदी न थाय.
हुं परद्रव्यनी क्रियाने करुं छुं एवुं मोही जीवोने अनादि संसारथी अज्ञान चाल्युं आवे छे. अनादि संसार एटले द्रव्य-क्षेत्र-काळ-भव अने भावरूप परावर्तन जीवने अनादिथी छे. शुभाशुभभावनुं परावर्तन एने अनादिथी चाल्युं आवे छे. पण ते अज्ञान छे. आ अज्ञान अत्यंत दुर्निवार छे. रागने घटाडी मंदरागपणे वा शुभराग रूपे परिणमवुं ए तो सहेली वात छे. एवा शुभभाव एणे अनंतवार कर्या छे. पण सम्यग्दर्शन पामवा माटे शुभराग कांई वस्तु नथी. भाई! आ तो धर्मनी पहेली सीडीनी वात छे. अहीं कहे छे के ‘भूतार्थपरिग्रहेण’-अहो! परमार्थनयनुं अर्थात् शुद्धद्रव्यार्थिक अभेदनयनुं ग्रहण करवाथी जो ते एक वार पण नाश पामे तो ज्ञानघन आत्माने फरी बंधन केम थाय? कदी न थाय.