समयसार गाथा ८६ ] [ २प३
भ्रमणा छे. शुद्धद्रव्यार्थिकनयथी एटले निश्चयथी आ वस्तुस्थिति कही एटले व्यवहारथी बीजुं (अन्यथा) कथन छे एम आवी गयुं. निश्चयथी कह्युं ते सत्यार्थ छे एम निर्णय करवो अने व्यवहारनयथी कह्युं होय ते एम नथी पण निमित्तनुं ज्ञान कराववा एम कह्युं छे, एम समजवुं. ज्ञानावरणीयकर्मथी ज्ञान रोकाय ए तो कथनशैली छे. कथन बे प्रकारे छे, वस्तु तो एक ज छे. व्यवहारना कथनने एम ज (जेम लख्युं होय तेम ज) माननार मिथ्याद्रष्टि छे.
मोक्षमार्ग प्रकाशकना सातमा अधिकारमां कह्युं छे के-“व्यवहारनय स्वद्रव्य-परद्रव्यने वा तेना भावोने वा कारण-कार्यादिने कोईना कोईमां मेळवी निरूपण करे छे माटे एवा श्रद्धानथी मिथ्यात्व छे.” वळी त्यां कह्युं छे के साचुं निरूपण ते निश्चय अने उपचार निरूपण ते व्यवहार. माटे निरूपणनी अपेक्षाए व्यवहारने मोक्षमार्ग कहेवामां आवे छे, पण एम छे नहि. (खरेखर व्यवहार मोक्षमार्ग ते मोक्षमार्ग नथी.) मोक्षमार्ग बे मानवा ते मिथ्यात्व छे. निश्चय अने व्यवहार बन्नेने उपादेय माने ते मिथ्यात्व छे. निश्चय अने व्यवहारनुं स्वरूप तो परस्पर विरुद्ध छे. व्यवहार अभूतार्थ छे, सत्यस्वरूपनुं निरूपण करतो नथी, पण कोई अपेक्षाथी निरूपण करे छे.
शुद्धनय भूतार्थ छे. जेवी वस्तुनी स्थिति होय तेवुं निरूपण करे छे. पंडित श्री टोडरमलजीने आचार्यकल्प कहेवामां आव्या छे. शास्त्रनां रहस्य खोलीने मोक्षमार्ग-प्रकाशकमां भरी दीधां छे. अहीं कहे छे-शुद्ध द्रव्यार्थिकनयथी वस्तुस्थितिनो नियम कह्यो. आनाथी विरुद्ध ते अनियम छे. जेने सम्यग्दर्शन थाय ते स्वाश्रयथी-निश्चयथी थाय, व्यवहारथी के परथी न थाय ए नियम छे, आ सिद्धांत छे.
आत्माने अनादिथी परद्रव्यना कर्ताकर्मपणानुं अज्ञान छे. ते जो परमार्थनयना ग्रहणथी एक वार पण विलय पामे तो फरीने न आवे-एम हवे कहे छेः-
‘इह’ आ जगतमां ‘मोहिनाम्’ मोही (अज्ञानी) जीवोनो ‘परं अहं कुर्वे’ परद्रव्यने हुं करुं छुं ‘इति महाहंकाररूपं तमः’ एवा परद्रव्यना कर्तृत्वना महा अहंकाररूप अज्ञानांधकार-‘ननु उच्चकैः दुर्वारं’ के जे अत्यंत दुर्निवार छे ते-‘आसंसारतः एव धावति’ अनादि संसारथी चाल्यो आवे छे. शुं कहे छे? हुं देशनी सेवा करुं छुं, परनी दया पाळुं छुं, परने सुखी करुं छुं, परने मारी शकुं छुं अने बचावी शकुं छुं इत्यादि अनेक प्रकारे अज्ञानीओने परद्रव्यना कर्तापणानो अहंकार छे, पण ते अज्ञान छे. कुंभार कहे के घडानी पर्याय माराथी थई, बाई कहे के दाळ-भात आदि रसोई में करी, गुमास्तो कहे के में सारा अक्षरे नामुं लख्युं अने शेठ कहे के में वेपार कर्यो-आ प्रमाणे परद्रव्यनी क्रियानो पोताने कर्ता माने ते बधा अहंकाररूप अज्ञान-अंधकारमां डूबेला मिथ्याद्रष्टि छे.