२प२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
विशुद्धज्ञान अधिकारमां (गाथा ३०८ थी ३११नी टीकामां) ‘क्रमनियमित’ शब्द पडयो छे. एक द्रव्यनी परिणति बीजा द्रव्यनी परिणतिरूप न थाय. बीजा द्रव्यनी परिणति पोताना द्रव्यरूप न थाय.
स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षामां एवो पाठ छे के-जड कर्मनी कोई अचिंत्य शक्ति छे के ते केवळज्ञानने रोके छे. ए तो पुद्गलमां उत्कृष्ट परिणमन केवुं थाय एनी त्यां वात करी छे. त्यां उपकारनुं-निमित्तनुं प्रकरण छे. एटले जेने केवळज्ञान प्रगट नथी तेने केवळज्ञानावरणीय कर्मनी प्रकृति निमित्त छे एम त्यां कह्युं छे.
वळी कोई एम कहे के विकार थवामां प० टका आत्मानो अपराध अने प० टका कर्मनो अपराध छे-तो एम नथी. सो ए सो टका आत्मा पोताना विकारनो कर्ता छे, अने निमित्तनुं एमां कांई कर्तव्य नथी, एक टको पण नहि. आत्माना सो टका आत्मामां, अने निमित्तना सो टका निमित्तमां छे, केमके तेमनो एकबीजामां अभाव छे. जीवनी विकारी पर्याय थाय एमां कर्मनी पर्यायनो अभाव छे अने कर्मना उदयमां जीवना विकारी परिणामनो अभाव छे. एकबीजामां अभाव होय तो ज भिन्न रही शके.
अहो! दिगंबर आचार्योए अजब-गजबनुं काम कर्युं छे. श्री अमृतचंद्रस्वामीए केवा कळश रच्या छे! लोकोए पोतानी द्रष्टि (अभिप्राय) छोडीने शास्त्र शुं कहे छे ते तरफ पोतानी द्रष्टि लगाववी जोईए.
प्रश्नः– विकार कर्मजनित छे एम शास्त्रमां ठेकठेकाणे आवे छे ने?
उत्तरः– हा, पण ए तो विभाव पोतानो (चैतन्यमय) स्वभाव नथी अने निमित्ताधीन थवाथी थाय छे ए अपेक्षाए एने कर्मजनित कह्यो छे. स्वभावजनित नथी माटे विकारने कर्मजनित कह्यो छे, पण कर्म छे ते पलटीने जीवना विकाररूप परिणम्युं छे एम नथी, कारण के एक द्रव्य अनेक द्रव्यरूप थाय नहि.
‘आ प्रमाणे उपरना श्लोकोमां निश्चयनयथी अथवा शुद्ध द्रव्यार्थिकनयथी वस्तुस्थितिनो नियम कह्यो.’
ज्ञानावरणीयकर्म ज्ञानने रोके ए तो व्यवहारनयनुं कथन छे. एटले शुं? एटले एम छे नहि पण निमित्तनुं ज्ञान कराववा एम कहेवामां आव्युं छे. अरे! लोकोने आवो निर्णय करवानी कयां फुरसद छे? परंतु आ मनुष्यभवमां करवा जेवुं आ ज छे. यथार्थ निर्णय न कर्यो तो भाई! अहींथी छूटीने कयां जईश? चोरासीना चक्करमां गोथां खाईश. भाई! एकवार भूतार्थद्रष्टिथी मिथ्यात्वने छेदीने समकित प्रगट कर. आ ज करवा योग्य छे.
अरे भाई! मारी पर्याय पर करे अने परनी पर्याय हुं करुं ए तारी मोटी