२६४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
आवे छे तेओ अजीव ज छे अने मिथ्यादर्शन, अज्ञान, अविरति इत्यादि भावो के जेओ चैतन्यना विकारमात्रथी जीव वडे भाववामां आवे छे तेओ जीव ज छे. भावार्थः– पुद्गलना परमाणुओ पौद्गलिक मिथ्यात्वादि कर्मरूपे परिणमे छे. ते कर्मनो विपाक (उदय) थतां तेमां जे मिथ्यात्वादि स्वाद उत्पन्न थाय छे ते मिथ्यात्वादि अजीव छे; अने कर्मना निमित्तथी जीव विभावरूप परिणमे छे ते विभाव परिणामो चेतनना विकार छे तेथी तेओ जीव छे. अहीं एम जाणवुं केः-मिथ्यात्वादि कर्मनी प्रकृतिओ छे ते पुद्गलद्रव्यना परमाणु छे. जीव उपयोगस्वरूप छे. तेना उपयोगनी एवी स्वच्छता छे के पौद्गलिक कर्मनो उदय थतां तेना उदयनो जे स्वाद आवे तेना आकारे उपयोग थई जाय छे. अज्ञानीने अज्ञानने लीधे ते स्वादनुं अने उपयोगनुं भेदज्ञान नथी तेथी ते स्वादने ज पोतानो भाव जाणे छे. ज्यारे तेमनुं भेदज्ञान थाय अर्थात् जीवभावने जीव जाणे अने अजीवभावने अजीव जाणे त्यारे मिथ्यात्वनो अभाव थईने सम्यग्ज्ञान थाय छे. * * * समयसार गाथा ८७ः मथाळुं परद्रव्यना कर्ताकर्मपणानी मान्यताने अज्ञान कहीने एम कह्युं के जे एवुं माने ते मिथ्याद्रष्टि छे; त्यां आशंका ऊपजे छे के-आ मिथ्यात्वादि भावो शी वस्तु छे? जो तेमने जीवना परिणाम कहेवामां आवे तो पहेलां रागादि भावोने पुद्गलना परिणाम कह्या हता ते कथन साथे विरोध आवे छे; अने जो पुद्गलना परिणाम कहेवामां आवे तो जेमनी साथे जीवने कांई प्रयोजन नथी तेमनुं फळ जीव केम पामे? आ आशंका दूर करवाने हवे गाथा कहे छेः- * गाथा ८७ः टीका उपरनुं प्रवचन * मिथ्यादर्शन, अज्ञान, अविरति इत्यादि जे भावो छे ते प्रत्येक, मयूर अने दर्पणनी जेम, अजीव अने जीव वडे भाववामां आवता होवाथी अजीव पण छे अने जीव पण छे. ते द्रष्टांतथी समजाववामां आवे छेः- जेम घेरो वादळी, लीलो, पीळो आदि (वर्णरूप) भावो के जे मोरना पोताना स्वभावथी मोर वडे भाववामां आवे छे (-बनावाय छे, थाय छे) तेओ मोर ज छे अने (दर्पणमां प्रतिबिंबरूपे देखाता) घेरो वादळी, लीलो, पीळो इत्यादि भावो के जेओ (दर्पणनी) स्वच्छताना विकारमात्रथी दर्पण वडे भाववामां आवे छे तेओ दर्पण ज छे.’ जुओ, लीलो, पीळो, वादळी जे मोरनो रंग छे ते मोरनो भाव छे माटे तेओ मोर ज छे. दर्पणमां जे प्रतिबिंब देखाय छे ते मोरनी पर्याय नथी; ते दर्पणनी स्वच्छतानो विकारमात्र छे; माटे ते दर्पण ज छे. अरीसामां जे अवस्था थई ते अरीसाथी