समयसार गाथा ८७ ] [ २६प
थई छे, मोरने लईने ते थई नथी. मोरमां जे रंग देखाय छे ते मोर छे अने अरीसामां जे छे ते अरीसानी स्वच्छताना विकारमात्रथी थयेली अरीसानी अवस्था छे. मोर मोरमां छे अने अरीसामां जे देखाय छे ते अरीसानी स्वच्छतानो विकार छे.
नथी. अने त्यारे तो ते निमित्त कहेवामां आवे छे; मोरथी जो ते अरीसानी अवस्था थई छे एम कहो तो मोर अरीसानी अवस्थानुं उपादान थई जाय.
अन्यमतवाळा इश्वरने कर्ता माने छे अने कोई जैनो विकारनो कर्ता कर्मने माने छे तो ते बन्ने मान्यता एक सरखी जूठी छे. अरीसानी अवस्था अरीसानी स्वच्छताना विकारने लईने थई छे, मोरने लईने ते थई नथी.
‘तेवी ज रीते मिथ्यादर्शन, अज्ञान, अविरति इत्यादि भावो के जेओ अजीवना पोताना द्रव्यस्वभावथी अजीव वडे भाववामां आवे छे तेओ अजीव ज छे अने मिथ्यादर्शन, अज्ञान, अविरति इत्यादि भावो के जेओ चैतन्यना विकारमात्रथी जीव वडे भाववामां आवे छे तेओ जीव ज छे.’
ज्ञानावरणीय आदि कर्म ते जडनी पर्याय छे. जडनी पर्यायनो भाव जडरूप छे. मिथ्यादर्शन, अज्ञान, अविरति ए जडनी अवस्था जडमां थाय छे. मिथ्यादर्शन ते दर्शनमोहनीय कर्मनी पर्याय, अज्ञान ते ज्ञानावरणीय कर्मनी पर्याय अने अविरति ते चारित्रमोहनीय कर्मनी पर्याय छे. क्रोध, मान, माया अने लोभ ते चारित्रमोहनीय कर्मनी पर्याय छे. कर्मनो उदय आवे ते जडनी पर्याय छे. कर्मना उदयथी जीवमां विकार थाय छे एम नथी. दर्शनमोहनीय कर्मनी पर्याय ते अजीवना द्रव्यस्वभावथी थई छे. जीवे मिथ्यात्वना भाव कर्या तो त्यां दर्शनमोहनीय कर्मनी पर्याय थई एम नथी. अने दर्शनमोहकर्मनो त्यां जडमां उदय आव्यो तो अहीं जीवमां मिथ्यात्वनी पर्याय थई एम नथी. परमाणुनी पर्याय त्यां पोताना द्रव्यस्वभावथी थई छे, अजीव वडे थई छे माटे ते अजीव ज छे.
जीवमां मिथ्या श्रद्धा अने राग द्वेषना परिणाम थाय ते जीव वडे थाय छे माटे ते जीव ज छे. अज्ञानीने भेदज्ञान नथी तेथी ते माने छे के राग थाय छे ते कर्मकृत छे. अहीं तो चोकखी वात करी छे के पाणी उनुं थाय छे ते अग्नि विना उनुं थाय छे. अग्निनी पर्याय अग्निमां छे ते अग्नि ज छे अने पाणीनी उष्ण पर्याय पाणीमां छे. पाणी अग्निथी उष्ण थयुं छे एम नथी. चोखा पाके छे ते चोखानी पोतानी पर्याय छे, उना पाणीथी चोखा पाके छे एम छे नहि.