Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२६६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

केटलाक कहे छे के-विकार कर्मथी थाय अने पोताथी पण थाय एम मानीए तो अनेकांत थाय. अरे भाई! ए अनेकांत छे ज नहि. विकार पोताथी थाय अने कर्मथी न थाय ए साचुं अनेकांत छे. जेम कुंभारथी घडो थयो नथी, अग्निथी पाणी उष्ण थयुं नथी तेम निमित्तथी जीवमां विकार थयो नथी. (निमित्तथी उपादानमां कांई थतुं नथी).

लोकोने लागे के आ तो साधारण भूल छे. पण भाई! आ तो मोटी मूळमां भूल छे. चारित्रमोहनो उदय छे माटे अहीं अव्रतना परिणाम थाय छे एम नथी. अविरति आदि भाव पोताथी थाय छे. कर्मना उदयथी अज्ञान थाय छे, कर्मना उदयथी मिथ्यात्व थाय छे के कर्मना उदयथी अविरति-विषयवासनाना भाव थाय छे एम छे नहि. दर्शनमोहनी पर्याय ते अजीवनो भाव छे अने तेथी अजीव ज छे. ज्ञानावरणीय कर्म ते अजीवनो भाव छे अने तेथी ते अजीव ज छे. अने जीवमां अज्ञान थाय ते जीवथी पोताथी थाय छे माटे ते जीव ज छे. मिथ्याश्रद्धा जीवनी पर्यायमां जीवथी थाय छे माटे ते जीव छे अने दर्शनमोहकर्मनी पर्याय छे ते अजीव छे.

बहु स्पष्ट वात छे के कर्मथी जीवने विकार थतो नथी. कर्मने लईने जो जीवनी भूल होय तो कर्म टळे तो भूल मटे; पोताना पुरुषार्थथी भूल मटे एम न रह्युं! पण एम छे नहि. पोताना पुरुषार्थथी भूल मटे छे.

राग द्वेषने कथंचित् पुद्गलना परिणाम कह्या छे ए बीजी वात छे. त्यां तो पोताना स्वभावमां राग उत्पन्न थाय एवी कोई शक्ति नथी. राग जीवनो स्वभाव नथी, विभाव छे. एटले रागथी भगवान आत्मा भिन्न छे एवुं भेदज्ञान थतां (सम्यग्दर्शन थतां) समकितीने आत्मा व्यापक अने निर्मळ पर्याय तेनुं व्याप्य छे. वळी राग एनी पर्यायमांथी भिन्न पडी जाय छे. एटले कर्म व्यापक अने राग तेनुं व्याप्य-एम गणीने निमित्तनी मुख्यताथी रागने पुद्गलना परिणाम कह्या छे.

अहीं कहे छे के ज्यां सुधी मिथ्यात्वना भाव छे त्यां सुधी मिथ्यादर्शन, अज्ञान अने राग द्वेष ते जीवनी पर्याय छे. ते जीव ज छे. परना कारणे, कर्मना कारणे बीलकुल ते पर्याय थई नथी. कुंभारथी घडो बीलकुल थयो नथी. गाथा ३७२ मां स्पष्ट कह्युं छे के-“जीवने परद्रव्य रागादिक उपजावे छे एम शंका न करवी; कारण के अन्य द्रव्य वडे अन्य द्रव्यना गुणनो उत्पाद करावानी अयोग्यता छे.” अन्य द्रव्यथी अन्य द्रव्यना गुणनी उत्पत्ति करी शकाती नथी. तेथी ए सिद्धांत छे के सर्व द्रव्यो पोतपोताना स्वभावथी ऊपजे छे. अहीं गुणनो अर्थ पर्याय थाय छे. पोतानी पर्यायनी योग्यताथी ते पर्याय उत्पन्न थाय छे. मिथ्यादर्शननी पर्याय पण पर्यायनी योग्यताथी पोतामां उत्पन्न थाय छे; परथी के कर्मथी बीलकुल नहि. तेम