Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ८७ ] [ २६७

आत्माथी कर्मबंधननी पर्याय उत्पन्न करावानी अयोग्यता छे. कर्मबंधनी पर्याय पोतानी योग्यताथी कर्मबंधपणे उत्पन्न थाय छे.

त्यारे कोई एम कहे के विकार थवामां प० टका कर्मना अने प० टका जीवना राखो. अहीं कहे छे के सो ए सो टका विकार जीवना परिणाममां पोताथी थाय छे; कर्मना कारणे एक टको पण नहि. उपादानना सो ए सो टका उपादानमां अने निमित्तना सो ए सो टका निमित्तमां छे. आत्मामां मिथ्यात्वनो भाव थयो ते सो ए सो टका पोताथी थयो छे; एक टको पण निमित्तना-दर्शनमोहकर्मना कारणे जीवमां मिथ्यात्वभाव थयो नथी.

लोको तो खावुं, पीवुं, रळवुं इत्यादि बहारमां अशुभमां रोकाई गया छे. तेमने आनो निर्णय करवानी कयां फुरसद छे? पण भाई! आनो यथार्थ निर्णय कर्या विना तने केटलुं नुकशान थई रह्युं छे तेनी तने खबर नथी. अरे! पछी तुं सर्वशक्ति (निर्णय करवानी) खोई बेसीश. अहीं निर्णय करावे छे के-जीव पोताना ऊंधा पुरुषार्थथी मिथ्यात्वादिपणे परिणमे छे अने पोताना सवळा पुरुषार्थथी मिथ्यात्वादिना नाशपणे (सम्यक्त्वादिपणे) परिणमे छे; तेमां परद्रव्यनुं रंचमात्र पण कारण नथी. परद्रव्य परद्रव्यमां स्थित छे. ते पोतानी सत्तामां आवतुं नथी. परद्रव्यनी सत्ता पोतामां आवी जाय तो परद्रव्यनी सत्तानो नाश थई जाय. आत्मा परद्रव्यनी सत्तामां प्रवेश करे तो परद्रव्यनी पर्याय करी शके. परंतु परद्रव्यनी सत्तामां आत्मा जाय तो पोतानी सत्तानो नाश थई जाय. पण एम कदीय बनतुं नथी. (कोई द्रव्य पोतानी सत्ता छोडतुं नथी). एक समयनी पर्यायसत्ता पण पोतानी पोतामां रहे छे. आवी ज वस्तुस्थिति छे. माटे पोते परनुं कांई करे अने पर पोतानुं कांई करे ए वात त्रणकाळमां संभवित नथी.

निगोदना जीवथी मांडी परमाणु आदि सर्वद्रव्यो पोताना स्वभावथी ज उत्पन्न थाय छे. पोतानी पर्यायनी योग्यताथी विकार आदि उत्पन्न थाय छे, परने लईने बीलकुल उत्पन्न थतो नथी. पूजानी जयमालामां आवे छे के-

“कर्म बिचारे कौन, भूल मेरी अधिकाई.”

कर्म छे ए तो जडनी पर्याय छे. भूल तो पोतामां पोताना कारणे थाय छे. कर्ता, कर्म, करण, संप्रदान, अपादान, अधिकरण एवा पोताना षट्कारकथी जीवमां विकार थाय छे. निश्चयथी विकार परकारकोनी अपेक्षा विना पोताथी थाय छे. जेम कुंभार वडे घडो करावानी अयोग्यता छे तेम कर्म वडे जीवनो विकार करावानी अयोग्यता छे.

माटी पोताना स्वभावने नहि उल्लंघती होवाने लीधे, कुंभार घडानो उत्पादक छे ज नहि; माटी ज कुंभारना स्वभावने नहि स्पर्शती थकी, पोताना स्वभावथी कुंभभावे