२६८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
ऊपजे छे. तेवी ज रीते मिथ्यादर्शन, अज्ञान, अविरति इत्यादि भावो के जेओ अजीवना पोताना द्रव्यस्वभावथी अजीव वडे भाववामां आवे छे तेओ अजीव ज छे अने मिथ्यादर्शन, अज्ञान, अविरति इत्यादि भावो के जेओ चैतन्यना विकारमात्रथी जीव वडे भाववामां आवे छे तेओ जीव ज छे.
अरे! जेने बे द्रव्यो वच्चे भिन्नता करवानी ताकात नथी तेने राग अने स्वभावने भिन्न करवानी ताकात कयांथी आवशे? रागथी भिन्न अंदर ज्ञायकस्वरूप चैतन्यस्वभावमय अतीन्द्रिय आनंदनो कंद भगवान आत्मा बिराजे छे. तेनो आश्रय करवाथी धर्मनी दशा- आनंदनी दशा उत्पन्न थाय छे. व्यवहारथी के रागथी धर्मनी दशा उत्पन्न थाय एम अमे देखता नथी एम आचार्यदेव कहे छे.
कोई एम कहे के सम्यग्दर्शन थया पछी जे अव्रतना परिणाम थाय छे ते चारित्रमोहकर्मना कारणे थाय छे; तेने कहे छे के एम नथी. जुओ, बळदेवे वासुदेवनुं मडदुं छ मास माटे खभे फेरव्युं त्यां चारित्रमोहना उदयना कारणे ते भाव आव्यो हतो एम नथी. ते भाव स्वयं पोताना कारणे थयेलो छे, चारित्रमोहनो उदय तो निमित्तमात्र छे.
एक छूटो परमाणु सूक्ष्म छे. ते स्थूळ स्कंधमां भळतां स्थूळताने धारण करे छे. तो ते स्थूळने लईने सूक्ष्ममांथी स्थूळ थयुं एम बीलकुल नथी. पोतानी पर्यायनी योग्यताथी सूक्ष्ममांथी स्थूळ थाय छे. बीजा परमाणुमां बीजाने स्थूळ करवानी अयोग्यता छे. ते परमाणुनी स्थूळ थवानी पोतानी योग्यता छे माटे ते सूक्ष्म पलटीने स्थूळ थाय छे.
रागथी आत्माने लाभ थाय, व्यवहार करतां करतां निश्चय थाय ए मान्यता मिथ्यादर्शन छे. पंचास्तिकायमां भिन्न साध्य-साधननी वात करी छे ते उपचारथी करी छे. वळी राग पोते करे अने नाखे कर्मना माथे तो ते पण अनीति-अन्याय छे. श्रीमद् राजचंद्रजीए कह्युं छे के तारो संसार तारा अपराधथी छे; तारो अपराध एटलो के पोताने भूलीने परने तुं पोतानुं माने छे. श्रीमद् राजचंद्रजी सम्यग्दष्टि अनुभवी पुरुष हता. अल्पकाळमां मोक्ष जवाना छे. तेमनी क्षयोपशम शक्ति अजब हती. तेमणे संक्षेपमां कह्युं छे के-जीव पोताना अपराधथी संसारमां रखडे छे, कर्मना कारणे रखडे छे एम नथी.
अहो! दिगंबर संतोए अलौकिक मार्ग कह्यो छे. कहे छे के-मिथ्यादर्शन, अज्ञान, अविरति इत्यादि भावो के जे चैतन्यना विकारमात्रथी जीव वडे भाववामां आवे छे ते जीव ज छे. विकारमात्रथी एटले पोतानी विकृत अवस्थाथी जीवमां विकार थयो छे, निमित्तथी थयो छे एम बीलकुल नथी. जेम लीली, पीळी आदि अवस्थापणे अरीसो