समयसार गाथा ८७ ] [ २६९
पोते परिणम्योछे ते अरीसानी स्वच्छतानो विकार छे. त्यां मोर परिणम्यो छे एम नथी. तथा ए दर्पणनी विकृति मोरने लईने थई छे एम नथी. मोर तो निमित्तमात्र छे. तेम आत्मामां जे विकार थाय छे ते आत्मानी पर्याय छे. कर्म त्यां विकारपणे परिणम्युं नथी. कर्मने लईने विकार थयो छे एम नथी. कर्म तो निमित्तमात्र छे. जीवमां विकार तेनी पोतानी योग्यताथी थयो छे. अज्ञानदशामां विकारनी क्रिया करवावाळो जीव छे अने भेदज्ञानपूर्वक सम्यग्दर्शन थतां ज्ञानी द्रव्यद्रष्टिए विकारने परनो जाणे छे कारण के ते चैतन्यनो स्वभाव नथी. आवी वात छे.
ऊंधो पुरुषार्थ करीने परवलणना भावो करे तो धर्म थतो नथी अने तेमां कर्म तो निमित्तमात्र छे. पोते पुरुषार्थने सुलटावीने स्ववलण करे तो धर्म अवश्य थाय छे. धर्म करवामां कर्म नडतुं नथी अने विकारपणे परिणमे त्यां पण कर्म कांई करतुं नथी.
एक भाई कहेता हता के भविष्यनुं आयुष्य बंधाई गयुं छे माटे परिणाम सुधरता नथी. जुओ, श्रेणीक राजाने नरकनुं आयुष्य बंधाई गयुं तो चारित्र लई शकया नहि. आ मान्यता बराबर नथी. नरकनुं आयुष्य बंधाई गयुं होय तोपण जीव सम्यग्दर्शन पामे छे. श्रेणीक राजाए सातमी नरकनुं आयुष्य बांध्युं हतुं. पछी सम्यग्दर्शन पाम्या; अने आयुष्यनी स्थिति तूटी गई. गति न फरी, पण आयुष्यनी स्थिति तूटी गई. श्रेणीक राजा क्षायिक समकित पाम्या छे अने त्यां नरकमां क्षणे क्षणे तीर्थंकरगोत्र बांधे छे. नरकगतिनो बंध पडयो माटे चारित्र न लई शकया ए वात बराबर नथी. पोताना एवा ज पुरुषार्थना कारणे चारित्र लई शकया न होता. श्रेणीक राजाने नरकमां जवानी भावना न हती पण कर्म लई गयां एम कोई कहे तो ते वात पण यथार्थ नथी. नरकमां जवानी पोतानी वर्तमान पर्यायनी योग्यताथी ते नरकमां गया छे. नरकनुं आयुष्य बांध्युं माटे नरकमां जवुं पडयुं एम नथी. पोतानी पर्यायनी योग्यताथी क्षेत्रांतर थईने नरकमां गया छे; कर्मना कारणे बीलकुल नहि एम अहीं कह्युं छे.
‘पुद्गलना परमाणुओ पौद्गलिक मिथ्यात्वादि कर्मरूपे परिणमे छे. ते कर्मनो विपाक (उदय) थतां तेमां जे मिथ्यात्वादि स्वाद उत्पन्न थाय छे ते मिथ्यात्वादि अजीव छे; अने कर्मना निमित्तथी जीव विभावरूप परिणमे छे ते विभाव परिणामो चेतनना विकार छे तेथी तेओ जीव छे.’
मरचामां तीखाशनुं जीवने ज्ञान थतां तीखाशनो मने स्वाद आव्यो एवो