२७० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
अज्ञानीने भ्रम थाय छे. साकरमां मीठाश छे. ते जडनी अवस्था छे. ते मीठाशनुं जीवने ज्ञान थतां मने मीठाशनो स्वाद आव्यो एम अज्ञानी भ्रमथी माने छे. तेम कर्मनो उदय आवतां तेमां मिथ्यात्वादि स्वाद उत्पन्न थाय छे. अहीं स्वादनो अर्थ एम छे के कर्मना उदयनो जे रस छे ते ज्ञानमां ख्यालमां आवे छे. कर्मना उदयनो रस तो जडनी पर्याय छे. ते जडनो स्वाद आत्मामां केम आवे? कर्मनो विपाक थतां तेमां मिथ्यात्वादि स्वाद उत्पन्न थाय छे एटले उदयना रसनुं जीवने ज्ञान थाय छे त्यां अज्ञानीने एम भ्रम थाय छे के जडना स्वादनुं मने वेदन थाय छे.
पोताना उपयोगमां मिथ्यात्वादिनो रस ख्यालमां आवे छे पण ज्ञानमां एनो रस आवतो नथी. जेम तीखाश, मीठास, खटाश ज्ञानमां ख्यालमां आवे छे पण ते तीखाश, मीठाश, खटाश ज्ञानमां आवती नथी. तेम कर्मना उदयनो रस ज्ञानमां ख्यालमां आवे छे पण ते स्वाद पोतानो नथी; ते स्वाद परनो छे. ते मिथ्यात्वादि अजीव छे, जड छे. जेम तीखाश, मीठाश वगेरे जड छे तेम मिथ्यात्वादि कर्मनो उदय पण जड छे.
जीवने पोताना मिथ्यात्वभावनुं वेदन थाय छे, पण जड मिथ्यात्वनुं (कर्मनुं) वेदन जीवने थतुं नथी. ज्ञानमां जडना रसनो ख्याल आवे छे त्यां जडनो हुं स्वाद लउं छुं एम अज्ञानी माने छे. जडनी पर्याय रूपी छे ते अरूपी जीवमां आवती नथी. ज्ञान जडना रसने- स्वादने जाणे छे पण ते जडनो स्वाद कांई ज्ञानमां आवी जतो नथी. सूक्ष्म वात छे, भाई! पण आ प्रमाणे न मानतां जडनो स्वाद मने आव्यो एवुं मानीने अज्ञानी जीव मिथ्यात्वभावनुं सेवन करे छे. जुओ, लाडु खाय त्यां लाडुना स्वादनुं ज्ञान थाय छे, पण लाडुनो स्वाद ज्ञानमां पेसतो नथी. लाडुनो स्वाद तो जड छे, रूपी छे अने भगवान आत्मा तो चैतन्यस्वरूप अरूपी छे. ए अरूपीने रूपीनो स्वाद केम आवे? न ज आवे. तेम कर्मनो उदय छे ते जड छे. ए जडनो स्वाद ज्ञान जाणे छे. पण अज्ञानीने भेदज्ञान नथी तेथी जडना स्वादनो ज्ञानमां ख्याल आवतां मने जडकर्मनो स्वाद आव्यो एम मानी मिथ्यात्वनुं सेवन करे छे.
कर्मनो विपाक थतां जे मिथ्यात्वादि स्वाद उत्पन्न थाय छे ते मिथ्यात्वादि अजीव छे. अहीं तो जडकर्म अने आत्मा वच्चे भेदज्ञान करवानी, परथी हुं भिन्न छुं एम प्रतीति करवानी वात चाले छे. पछी मिथ्यात्व अने रागद्वेषना विकारी भावोथी स्वना आश्रये भेदज्ञान थाय छे. कर्मना उदयथी विकार थयो अने विकारना कारणे कर्मबंधन थयुं एम माने एने तो व्यवहारश्रद्धानां पण ठेकाणां नथी. हजी व्यवहारश्रद्धानां पण ठेकाणां न होय एने रागथी भिन्न निज चैतन्यस्वरूपनो अनुभव केम थाय? अहो! जैन तत्त्वज्ञान बहु गंभीर अने सूक्ष्म छे!