Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ८७ ] [ २७१

भाई! आ तो अंतरनी परम सत्यनी वातो छे; आ कोई कल्पना नथी. कर्मना निमित्तथी जीव विभावरूप परिणमे छे. ते विभाव परिणामो चेतनना विकार छे तेथी तेओ जीव छे. जीवना परिणामो मिथ्यात्वादि थाय छे ते पोताथी थाय छे. अने कर्मनो उदय जे निमित्त छे ते जडना भाव छे तेथी जड छे, अजीव छे. जडना उदयना परिणाम जडमां छे. बे वच्चे निमित्तनैमित्तिक संबंध छे. पण निमित्त (कर्म) कर्ता छे अने विकार एनुं कार्य छे एम त्रणकाळमां नथी. तेम जीवनो विकार कर्ता अने जड कर्मनो बंध एनुं कार्य छे एम पण नथी. भैया भगवतीदासना निमित्त-उपादानना ४७ दोहा छे एमां बधुं घणुं स्पष्ट कर्युं छे.

विकारनी पर्याय पोताना षट्कारक-कर्ता, कर्म, करण, संप्रदान, अपादान, अधिकरण-थी थाय छे; केमके कर्ता, कर्म आदि शक्ति द्रव्यरूप अने गुणरूप छे तो पर्यायमां पण षट्कारक परिणमन छे. एक समयनी मिथ्यात्वनी पर्यायनो कर्ता मिथ्यात्व, एनुं कर्म मिथ्यात्व, एनुं करण मिथ्यात्व, एनुं संप्रदान मिथ्यात्व अने एनां अपादान अने अधिकरण मिथ्यात्व छे. मिथ्यात्वनुं कर्ता आदि जड कर्म नथी अने जीवना द्रव्य-गुण पण नथी; केमके जड कर्म पर छे अने द्रव्य-गुण त्रिकाळ शुद्ध छे. आमां निमित्तनो अने निश्चय-व्यवहारनो खुलासो आवी जाय छे.

तेवी रीते पोताना द्रव्यनो आश्रय लईने जे सम्यग्दर्शन ज्ञान-चारित्ररूप धर्मनी पर्याय प्रगट थई ते पण निरपेक्ष छे. तेमां व्यवहार अने निमित्तनी अपेक्षा नथी. नियमसारनी बीजी गाथामां आ वात आवे छे. अहा! परम वीतरागदेव सर्वज्ञना शासनमां आचार्योए गजब स्पष्ट कर्युं छे. त्यां कह्युं छे-“निज परमात्मतत्त्वनां सम्यक् श्रद्धान-ज्ञान- अनुष्ठानरूप शुद्धरत्नत्रयात्मक मार्ग परम निरपेक्ष होवाथी मोक्षनो उपाय छे अने ते शुद्ध रत्नत्रयनुं फळ स्वात्मोपलब्धि छे.” अहाहा...! शुद्ध रत्नत्रयात्मक मोक्षनो मार्ग परम निरपेक्ष छे एटले के निमित्तनी अने व्यवहारनी अपेक्षा राख्या विना मोक्षमार्गनी पर्याय पोताना षट्कारकथी प्रगट थाय छे. सम्यग्दर्शन-ज्ञाननी एक समयनी जे परिणति प्रगटी ते पोताना षट्कारक परिणमनथी प्रगटी छे; द्रव्य-गुणथी पण नहि. पर्याय द्रव्यनी सन्मुख थई छे बस एटली वात छे; पण द्रव्य-गुणथी पर्याय प्रगटी छे एम नथी.

मोटा महंत नाम धरावनारा पण अत्यारे आ विषयमां गोटा ऊभा करे छे. अरेरे! भगवाननो विरह पडयो! केवळज्ञान रह्युं नहि अने साथे चार ज्ञानने धारण करनारा गणधरना पण विरह पडया! आवी स्थितिमां शास्त्रना ऊंधा अर्थ करे त्यां कोने कहीए? अरे! भगवाननी हाजरी नहि अने पोतानी मति-कल्पनाथी फावे तेम अर्थ करीने भारे गडबड ऊभी करी छे. जेम पिताना मरण पछी मिल्कतनी वहेंचणीमां छोकराओ अंदर-