Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२७२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

अंदर झघडा करे छे तेम भगवाननो विरह थया पछी मार्गमां अज्ञानीओ मोटी गडबड ऊभी करी रह्या छे. पण भाई! मार्ग तुं कहे छे एवो नथी. आ ज मार्ग छे. व्यवहार छे तो सम्यग्दर्शन थयुं छे एम नथी. सम्यग्दर्शननी पर्याय त्रिकाळी शुद्ध द्रव्यना आश्रये उत्पन्न थई छे. शुद्धना आश्रये एटले द्रव्यनी सन्मुख थईने ते पर्याय प्रगटी छे; पण द्रव्यना कारणे ते पर्याय प्रगटी छे एम नथी. ते पर्याय पोताथी थई छे एम भगवान पोकार करीने यथार्थ तत्त्व कहे छे. द्रव्य खरेखर तो निर्मळ पर्यायनुं पण कर्ता नथी. द्रव्यस्वभाव छे ते पर्यायनुं कर्ता नथी. अरे भाई! मोक्षमार्गनी पर्यायनुं द्रव्य कर्ता नथी. परमात्मप्रकाश दोहा ६८मां अने समयसारनी गाथा ३२०नी जयसेनाचार्यनी टीकामां आ वात स्पष्टपणे आवे छे. त्यारे प्रवचनसार गाथा १८९मां (टीकामां) एम कह्युं छे के-“रागपरिणाम ज आत्मानुं कर्म छे, ते ज पुण्यपापरूप द्वैत छे, रागपरिणामनो ज आत्मा कर्ता छे, तेनो ज ग्रहनार अने छोडनार छे;-आ, शुद्ध द्रव्यना निरूपण स्वरूप निश्चयनय छे.” पर्याय पोताथी थई छे तेथी तेने निश्चयनय कह्यो छे. आत्मा विकार करे अने विकार छोडे ए शुद्धनयनुं कथन छे. एटले के विकार पोताथी थाय छे माटे तेने शुद्ध द्रव्यना निरूपण स्वरूप निश्चयनय कह्यो छे. निमित्तनी अपेक्षा विना विकार पोतामां थाय छे माटे तेने शुद्धनय कह्यो छे. निश्चयनय केवळ स्वद्रव्यना परिणामने दर्शावतो होवाथी तेने शुद्ध द्रव्यनुं कथन करनार कह्यो छे. अने व्यवहारनय परद्रव्यना परिणामने आत्मपरिणाम दर्शावतो होवाथी तेने अशुद्ध द्रव्यनुं कथन करनार कह्यो छे. विकारी परिणाम द्रव्यकर्मना निमित्तथी थया छे ए अशुद्धनयनुं कथन छे अने विकारी परिणाम पोताथी थया छे ए शुद्धनयनुं कथन छे. “शुद्धपणे तथा अशुद्धपणे बन्ने प्रकारे द्रव्य प्रतीत कराय छे. परंतु अहीं निश्चयनय साधकतम होवाथी ग्रहण करवामां आव्यो छे; (कारण के) साध्य शुद्ध छे तेथी द्रव्यना शुद्धत्वनो द्योतक होवाने लीधे निश्चयनय ज साधकतम छे, पण अशुद्धत्वनो द्योतक व्यवहारनय साधकतम नथी.” आ ज्ञेय अधिकार छे माटे राग, द्वेष, पुण्य, पाप, दया, दान अने मिथ्यात्वभाव पोतानी पर्यायमां पोताथी थाय छे ते शुद्धनयनुं कथन छे एम कह्युं छे. शुद्धनय साधकतम छे माटे अशुद्धनयनुं लक्ष छोडी दे-एम कहे छे प्रश्नः– द्रव्यसामान्यनुं आलंबन ज उपादेय छे, छतां अहीं रागपरिणामना ग्रहण- त्यागरूप पर्यायोनो स्वीकार करनार निश्चयनयने उपादेय केम कह्यो छे? उत्तरः– ‘रागपरिणामनो करनार पण आत्मा ज छे अने वीतरागपरिणामनो करनार पण आत्मा ज छे; अज्ञानदशा पण आत्मा स्वतंत्रपणे करे छे अने ज्ञानदशा पण आत्मा स्वतंत्रपणे करे छे’-आवा यथार्थ ज्ञाननी अंदर द्रव्यसामान्यनुं ज्ञान गर्भितपणे समाई ज जाय छे.