Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ८७ ] [ २७३

जेने पर्यायनी स्वतंत्रतानुं भान नथी तेने द्रव्यनी स्वतंत्रता केम बेसे? कर्मथी विकार थाय एम माननारने हुं ज्ञाता-द्रष्टा छुं एम केम बेसे? कर्मथी विकार माननारे पोतानी पर्यायने पराधीन मानी छे. तेने द्रव्यनी स्वतंत्रतानी वात केम समजाय?

हवे कहे छे-‘अही एम जाणवुं केः- मिथ्यात्वादि कर्मनी प्रकृतिओ छे ते पुद्गलद्रव्यना परमाणु छे. जीव उपयोगस्वरूप छे. तेना उपयोगनी एवी स्वच्छता छे के पौद्गलिक कर्मनो उदय थतां तेना उदयनो जे स्वाद आवे तेना आकारे उपयोग थई जाय छे. अज्ञानीने अज्ञानने लीधे ते स्वादनुं अने उपयोगनुं भेदज्ञान नथी तेथी ते स्वादने ज पोतानो भाव जाणे छे. ज्यारे तेमनुं भेदज्ञान थाय अर्थात् जीवभावने जीव जाणे अने अजीवभावने अजीव जाणे त्यारे मिथ्यात्वनो अभाव थईने सम्यग्ज्ञान थाय छे.’

ज्ञानमां जडना स्वादनो ख्याल आवे छे, पण जडनो स्वाद ज्ञानमां आवतो नथी. कर्मना उदयनो स्वाद आवे एटले के तेना आकारे उपयोग थाय छे. ज्ञाननी पर्यायमां जडनी पर्यायनो ख्याल आवे छे. खरेखर तो विकारने ज्ञान जाणतुं नथी, कर्मना उदयने पण ज्ञान जाणतुं नथी; परंतु ते विकार संबंधीनुं जे ज्ञान पोतामां थयुं तेने ज्ञान जाणे छे.

दरेक पर्याय पोताथी थाय छे अने ते पण क्रमबद्ध थाय छे. जे समये जे थवानी होय ते ज पर्याय ते समये ज थाय छे, आगळ पाछळ थती नथी. सामान्यनुं ते पर्याय विशेष छे. आवुं न माने ते वैशेषिक मतने माननार मिथ्याद्रष्टि छे. पर्यायनी स्थिति एकरूप रहेती नथी. एटले अज्ञानीने भ्रम थई जाय छे के निमित्त आव्युं तो पर्याय बदली गई. पाणी ठंडी अवस्था बदलीने उष्ण थयुं त्यां अज्ञानीने भ्रम थाय छे के अग्नि आवी तो पाणी उनुं थयुं परंतु एम छे नहि. पाणी पोताथी उष्ण थयुं छे, अग्निथी नहि.

समयसार कळश २११मां कह्युं छे के-“वस्तुनी एकरूप स्थिति होती नथी; माटे वस्तु पोते ज पोताना परिणामरूप कर्मनी कर्ता छे”-ए निश्चय सिद्धांत छे. प्रत्येक पदार्थनी एक अवस्था बदलीने बीजी थाय छे ते पोताथी थाय छे, निमित्तथी नहि-एवो वस्तुनो स्वभाव छे.

वस्तु द्रव्यपर्यायस्वरूप होवाथी सर्वथा नित्यपणुं बाधा सहित छे. माटे वस्तु पोते ज पोताना परिणामस्वरूप कर्मनी कर्ता छे. ज्ञाननो स्वभाव स्वपरप्रकाशक छे. एटले रागनुं ज्ञान थाय छे त्यां राग छे तो रागनुं ज्ञान थाय छे एम नथी. ज्ञान स्वने जाणे अने रागने पण जाणे-एवो ज्ञाननी पर्यायनो स्वपरप्रकाशक स्वभाव छे. रागने ज्ञान