Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२७४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

जाणे छे एम कहेवुं ते व्यवहार छे. खरेखर तो आत्मा पोताना ज्ञानने जाणे छे. आ वात गाथा ७पमां आवी गई छे.

अज्ञानीने अज्ञानने लीधे ते स्वादनुं अने उपयोगनुं भेदज्ञान नथी. तेथी ते स्वादने ज पोतानो भाव जाणे छे. अज्ञानीने खबर नथी के आ स्वाद जाणवामां आवे छे ते परचीज छे अने पोतानी पर्यायमां जे मिथ्यात्वादि भाव थाय छे ते मारी चीज छे. आवुं अज्ञानीने भेदज्ञान नथी.

ज्यारे तेमनुं भेदज्ञान थाय अर्थात् जीवभावने जीव जाणे अने अजीवना भावने अजीव जाणे त्यारे मिथ्यात्वनो अभाव थईने सम्यग्ज्ञान थाय छे. अने त्यारे ज्ञाननी पर्याय स्वने जाणे छे अने रागने पण (भिन्नपणे) जाणे छे. भेदज्ञान थतां ज्ञाननो स्वपरप्रकाशकस्वभाव होवाथी ज्ञान पोतामां रहीने स्वपरने जाणे छे अने ते सम्यग्ज्ञान छे.

[प्रवचन नं. १प२ शेष, १प३, १प४ * दिनांक १०-८-७६ थी १२-८-७६]