Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 88.

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 1047 of 4199

 


गाथा–८८

काविह जीवाजीवाविति चेत्–

पोग्गलकम्मं मिच्छं जोगो अविरदि अणाणमज्जीवं।
उवओगो अण्णाणं अविरदि मिच्छं च
जीवो दु।। ८८।।

पुद्गलकर्म मिथ्यात्वं योगोऽविरतिरज्ञानमजीवः।
उपयोगोऽज्ञानमविरतिर्मिथ्यात्वं च जीवस्तु।। ८८।।

हवे पूछे छे के मिथ्यात्वादिकने जीव अने अजीव कह्या ते जीव मिथ्यात्वादि अने अजीव मिथ्यात्वादि कोण छे? तेनो उत्तर कहे छेः-

मिथ्यात्व ने अज्ञान आदि अजीव, पुद्गलकर्म छे;
अज्ञान ने अविरमण वळी मिथ्यात्व जीव, उपयोग छे. ८८.

गाथार्थः– [मिथ्यात्वं] जे मिथ्यात्व, [योगः] योग, [अविरतिः] अविरति अने [अज्ञानम्] अज्ञान [अजीवः] अजीव छे ते तो [पुद्गलकर्म] पुद्गलकर्म छे; [च] अने जे [अज्ञानम्] अज्ञान, [अविरतिः] अविरति अने [मिथ्यात्वं] मिथ्यात्व [जीवः] जीव छे [तु] ते तो [उपयोगः] उपयोग छे.

टीकाः– निश्चयथी जे मिथ्यादर्शन, अज्ञान, अविरति इत्यादि अजीव छे ते तो, अमूर्तिक चैतन्यपरिणामथी अन्य एवुं मूर्तिक पुद्गलकर्म छे; अने जे मिथ्यादर्शन, अज्ञान, अविरति इत्यादि जीव छे ते, मूर्तिक पुद्गलकर्मथी अन्य एवो चैतन्यपरिणामनो विकार छे.

* * *

समयसार गाथा ८८ः मथाळुं

हवे पूछे छे के मिथ्यात्वादिने जीव अने अजीव कह्या ते जीव मिथ्यात्वादि अने अजीव मिथ्यात्वादि कोण छे? तेनो उत्तर कहे छेः-

* गाथा ८८ः टीका उपरनुं प्रवचन *

‘निश्चयथी जे मिथ्यादर्शन, अज्ञान, अविरति इत्यादि अजीव छे ते तो, अमूर्तिक चैतन्यपरिणामथी अन्य एवुं मूर्तिक पुद्गलकर्म छे, अने जे मिथ्यादर्शन, अज्ञान, अविरति इत्यादि जीव छे ते, मूर्तिक पुद्गलकर्मथी अन्य एवो चैतन्यपरिणामनो विकार छे.’