Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 1048 of 4199

 

२७६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

मिथ्या श्रद्धा, मिथ्याज्ञान अने मिथ्याचारित्र-ए जीवनी पर्याय छे. ते अमूर्तिक चैतन्यना (विकारी) परिणाम छे. अने जे दर्शनमोहनीय, ज्ञानावरणीय अने चारित्र- मोहनीयनी पर्याय छे ते पौद्गलिक कर्म छे, जड छे, मूर्तिक छे. बन्ने चीज परस्पर भिन्न छे. मतलब के मिथ्यादर्शन, अज्ञान अने अविरति जे जीवनी पर्याय छे ते जीवनो पोतानो दोष छे अने ते पोताथी थयो छे, कर्मथी थयो छे एम नथी.

पुद्गलनी अवस्थाथी भिन्न, रागद्वेष रहित एवो आत्मा त्रिकाळी शुद्ध चैतन्यतत्त्व छे. तथापि हुं रागी-द्वेषी छुं एवी मान्यता ते चैतन्यनो विकार छे अने ते मिथ्यात्व छे. जे ज्ञान पोताना त्रिकाळी शुद्ध स्वद्रव्यने न जाणे अने एकला परद्रव्यने जाणे ते अज्ञान छे. अने रागद्वेषरूपे जे परिणमन छे ते अविरतिरूप दोष छे. आ मिथ्यात्व, अज्ञान अने अविरति ते चैतन्यना विकारी परिणाम छे अने ते पोताथी थया छे, पुद्गलकर्मथी थया छे एम नथी; केमके ते बन्ने भिन्न भिन्न छे.

सम्यग्द्रष्टिने स्वभावसन्मुखतानुं जोर छे. तेथी तेने जे राग आवे छे तेनो तेने खेद होय छे. धर्मी रागनो स्वामी नथी. जुओ, प्रथम स्वर्गनो इन्द्र एकभवतारी छे. ते अष्टाह्निका महोत्सवमां नंदीश्वरद्वीपमां जाय छे. नंदीश्वरद्वीपमां भगवाननी मनोहर शाश्वत प्रतिमाओ छे. त्यां जईने ते भगवाननी पूजा-भक्ति करे छे अने खूब उल्लासथी नाचे छे. ए बधा शुभभाव छे अने ते दुःखरूप छे एम ते जाणे छे. छतां अशुभथी बचवा एवा शुभभाव धर्मीने आवे ज छे. अहाहा...! केवी विचित्रता! बहारथी हरख देखाय छतां अंदरथी तेनो खेद होय छे. धर्मीने जेने अतीन्द्रिय आनंदना नाथनो स्वाद आव्यो छे तेने जे कोई रागादि दोष आवी जाय छे तेनुं अल्प बंधन तेने पण थाय छे, पण ते द्रव्यद्रष्टिनी प्रधानतामां मुख्य नथी.

प्रश्नः– तो ज्ञानीने भोग निर्जरानो हेतु कह्यो छे ने?

उत्तरः– हा, पण कई अपेक्षाए? ज्ञानीनी द्रष्टि निर्मळानंदना नाथ भगवान शुद्ध चैतन्यमय आत्मा उपर स्थिर थई छे अने तेने अनंतानुबंधी आदि कषायनो अभाव वर्ते छे तेथी व्रतादि क्रियामां वा किंचित् भोगाभिलाषनी क्रियाना प्रसंगमां पण तेने ज्ञानभाव ज छे. माटे तेने निरंतर निर्जरा थती होवाथी ज्ञानीने भोग निर्जरानो हेतु छे एम आरोपथी कह्युं छे. शुं भोग ते निर्जरानो हेतु होय? शुं ज्ञानी निरंकुश भोगमां रहे अने निर्जरा थाय? एम नथी, भाई! ज्ञानीने द्रष्टिनी प्रधानता छे. तेने भोगनी इच्छा नथी. ए तो भोग प्रति उदासीन ज होय छे. भोगना स्वामीपणे नहि परिणमता ज्ञानीने भोग निर्जरा हेतु छे एम उपचारथी कह्युं छे. भाई! ज्यां जे अपेक्षा होय ते यथार्थ समजवी जोईए.

ज्ञानीने पण जे किंचित् राग आवे छे ते दोष छे अने ते दुःखरूप छे एम ते