समयसार गाथा ८८ ] [ २७७
जाणे छे, केमके राग बंधननुं कारण छे. मुनिने महाव्रतनो जे विकल्प आवे छे ते राग छे, ते जगपंथ छे केमके ते उदयभाव छे. अहा! मुनिना पंचमहाव्रतना भाव पण जो दुःखरूप जगपंथ छे तो अशुभभावनुं तो कहेवुं ज शुं? ए तो नुकशान ज नुकशान छे. मिथ्याद्रष्टिने जे विषयवासना अने परस्त्रीसेवन आदिना तीव्र अशुभभाव थाय छे ते दुर्गतिनुं ज कारण छे.
अहीं कहे छे-मिथ्यादर्शन आदि भाव के जे अजीव छे ते तो मूर्तिक पुद्गलकर्म छे अने ते अमूर्तिक चैतन्यपरिणामथी अन्य छे; अने जे मिथ्यादर्शन आदि भाव जीव छे ते चैतन्यपरिणामनो विकार छे अने ते मूर्तिक पुद्गलकर्मथी अन्य छे. अहाहा...! केटलुं स्पष्ट कर्युं छे! भेदज्ञान करवानी वात छे!
भाई! भेदज्ञान अने सम्यग्दर्शन कोई अलौकिक चीज छे. उपरथी मानी ले तेवी चीज नथी. पोतानो चैतन्य भगवान अनाकुळ शांतरसनो ध्रुवकंद छे. तेनी द्रष्टि करतां रागनी द्रष्टि छूटी जाय छे अने ते सम्यग्दर्शन छे. धर्मीने व्यवहाररत्नत्रयनो राग आवे छे पण एनी रुचि एने छूटी जाय छे. जे भावथी तीर्थंकरनामकर्म बंधाय ते भावनी रुचि धर्मीने छूटी गई होय छे. आवी वात छे. ८८ पूरी थई.