समयसार गाथा ८९ ] [ २७९
निमित्तथी छे. एम नथी के पहेलां ए शुद्ध ज हतो अने हवे तेमां नवो परिणामविकार थयो छे. जो एम होय तो सिद्धोने पण नवो परिणामविकार थवो जोइए. पण एम तो थतुं नथी. माटे ते अनादिथी छे एम जाणवुं.
हवे फरी पूछे छे के मिथ्यादर्शनादि चैतन्यपरिणामनो विकार कयांथी थयो? तेनो उत्तर कहे छेः-
‘जोके निश्चयथी पोताना निजरसथी ज सर्व वस्तुओनुं पोताना स्वभावभूत एवा स्वरूप-परिणमनमां समर्थपणुं छे-’ शुं कहे छे? आत्मा अने परमाणु आदि प्रत्येक पदार्थमां पोताना स्वभावना रसथी स्वभावभूत एवा स्वरूपपरिणमनमां समर्थपणुं छे. भगवान आत्मामां निश्चयथी पोताना निजरसथी-ज्ञानरसथी, आनंदरसथी, शांतरसथी निर्विकाररसथी पोताना स्वभावभूत एवा स्वरूपपरिणमनमां समर्थपणुं छे. पुण्य-पापना जे भाव थाय ए तो स्वभावभूत स्वरूपपरिणमन नथी. अहीं कहे छे के भगवान आत्मा पोताना अनाकुळ आनंद, अतीन्द्रिय ज्ञान अने अतीन्द्रिय स्वच्छताना पोताना शुद्ध स्वभावे परिणमे एवुं एमां सामर्थ्य छे. तो विकार केम छे? तो कहे छे-
‘तोपण अनादिथी अन्यवस्तुभूत मोह साथे संयुक्तपणुं होवाथी, आत्माना उपयोगनो, मिथ्यादर्शन, अज्ञान, अविरति एम त्रण प्रकारनो परिणामविकार छे.’ अन्यवस्तुभूत मोह साथे संयुक्तपणुं होवाथी एटले एना संयोगना आश्रयथी विकार उत्पन्न थाय छे. संयोगथी विकार उत्पन्न थाय छे एम नहि, पण जड मोहना संयोगना आश्रयथी, परनो संबंध करवाथी आत्माना उपयोगनो मिथ्यादर्शन, अज्ञान अने अविरति एम त्रण प्रकारनो परिणामविकार छे.
अहाहा...! आत्मामां निजरसथी चैतन्यमयस्वभावनो अनुभव थईने परिणमन थाय एवुं एनुं सामर्थ्य छे. आत्माना द्रव्य-गुण अने तेनो वर्तमान वर्ततो अंश कारणशुद्धपर्याय तो शांतरस, चैतन्यरस, अकषायरस वडे शुद्ध, पवित्र छे. अने सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रनी निर्मळ परिणतिरूपे परिणमन करे एवुं एनुं सामर्थ्य छे. अहाहा...! भगवान आत्मा तो अतीन्द्रिय आनंदरस अने अतीन्द्रिय ज्ञानरसनो स्वामी थईने अतीन्द्रिय आनंदरूपे परिणमे एवुं एनुं सामर्थ्य छे. तथापि अनादि काळथी अन्य वस्तु जे जड मोह तेनी साथे संबंध कर्यो छे ते कारणे तेना उपयोगमां विकारपरिणाम