Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२८० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

उत्पन्न थाय छे. भगवान आत्मानो जाणवा-देखवानो उपयोग तो सदा निर्मळ, शुद्ध छे. तेमां अनादि मोहकर्मना संयोगना वशे मिथ्यात्व, अज्ञान अने अविरति-एम त्रण प्रकारे विकारपरिणामनी पोताथी उत्पत्ति छे.

समयसार कळश १७पमां कह्युं छे के-सूर्यकांतमणि पोताथी ज अग्निरूपे परिणमतो नथी, तेना अग्निरूप परिणमनमां सूर्यनुं बिंब निमित्त छे. तेम आत्मा पोताने रागादिकनुं निमित्त कदी पण थतो नथी, तेमां निमित्त परसंग ज-परद्रव्यनो संग ज छे. आवो वस्तुस्वभाव प्रकाशमान छे. विकार परसंगथी नहि पण परद्रव्यनो संग पोते करे छे तो थाय छे. मिथ्यात्वादि परिणाम पोताना षट्कारकना परिणमनथी थाय छे एम श्री पंचास्तिकायनी गाथा ६२मां कह्युं छे. शुद्ध चैतन्यस्वभावमय स्वनो संग छोडी जीव कर्मनो संग करे छे तो पोतामां विकारभाव पोताथी उत्पन्न थाय छे. आ महा सिद्धांत छे.

भगवान वीतरागदेवनो आ अलौकिक मार्ग छे. गणधरदेवो अने एकावतारी इन्द्रोए जेनो स्वीकार कर्यो छे ते आ मार्ग छे. मध्यलोकमां असंख्य द्वीप-समुद्र छे, तेमां छेल्लो स्वयंभूरमण नामनो समुद्र छे. तेमां हजार जोजन लांबा शरीरवाळा मगरमच्छ छे. तेमां पंचम गुणस्थानवाळा जीवो पण छे. आत्मा छे ने! अंतर्द्रष्टि करतां आत्मानुं भान प्रगट थई गयुं होय छे. अहीं कहे छे-आत्मा तो चैतन्यनी झळहळ ज्योतिस्वरूप शांतिनो सागर छे. तेमां आ राग कयांथी आव्यो? तो कहे छे-पर्यायमां पोते परनो संग कर्यो तो राग उत्पन्न थयेलो छे. पोतानो संग करे तो राग उत्पन्न न थाय. पोतानो स्वभाव सदा शुद्ध छे. तेनो संग करे, तेनुं लक्ष करे तो शुद्धता ज उत्पन्न थाय.

भाई! आ सांभळीने वस्तुतत्त्वनो अंदर निर्णय करवो. कोई तो एवा होय छे के अहीं सांभळे एटले आ वातनी हा पाडे अने वळी बीजे बीजी वात सांभळे तो तेनी पण हा पाडे. एम के सौनां मन राजी राखवां पडे. भाई! गंगा किनारे गंगादास अने जमना किनारे जमनादासनी रीतथी सौ राजी थशे पण आत्मा राजी नहि थाय. सांभळवानुं तात्पर्य तो अंदर रागथी भिन्न शुद्ध चैतन्यस्वभावमय परिपूर्ण प्रभु आत्मा बिराजे छे तेनो निर्णय करी तेनी प्रतीति करवी, तेनो अनुभव करवो ए छे. आ कांई लोकरंजननी वात नथी; आ तो आत्माना हितनी वात छे, अने आत्माना हित माटे कहेवाय छे.

अहीं कहे छे के सर्व पदार्थो पोताना निजरसथी पोताना स्वभावभूत स्वरूप- परिणमनमां समर्थ छे. परमाणुमां ते छूटो होय त्यारे शुद्ध परिणमन थाय एवुं एनुं सामर्थ्य छे. परंतु ते (परमाणु) बीजा स्कंधना संगमां जाय तो विभावपर्याये थाय छे. बे परमाणुथी मांडी अनंत परमाणुओना स्कंधमां विभावपर्याय उत्पन्न थाय छे. ते विभाव परसंगथी