२८४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
छे अने तेमां मोहकर्म निमित्त छे. निमित्त छे एटले कर्मे विकार कराव्यो छे एम नथी. कर्म जीवना विकारनुं कर्ता नथी. पण जीवमां विकार पोताथी छे एमां मोहकर्म निमित्त छे. आत्मामां अनादि मिथ्यात्वदशा छे तेमां दर्शनमोहकर्म निमित्त छे; पण दर्शनमोहकर्म मिथ्यात्वदशानुं कर्ता नथी.
‘एम नथी के पहेलां ए शुद्ध ज हतो अने हवे तेमां नवो परिणामविकार थयो छे.’ पर्यायमां विकार अनादिनो छे अने कर्मनुं निमित्त पण अनादिनुं छे. समय समय थईने अनंतकाळथी प्रवाहरूपे आत्मानी पर्यायमां विकार छे. शरीर मारुं, इन्द्रियो मारी, राग मारो एवी मान्यता सहित जीवने अनादि परंपराथी विकार छे. आ परिणामविकार कांई नवो नथी. जो एम होय तो सिद्धोने पण नवो परिणामविकार थवो जोईए, पण एम तो थतुं नथी. माटे ते अनादिथी छे एम जाणवुं.
प्रश्नः– स्फटिकमां जे लाल झांय देखाय छे ते प्रत्यक्ष लाल वासणने लीधे देखाय छे ने?
उत्तरः– नहि. स्फटिकमां जे लाल झांय देखाय छे ते लाल वासणने लीधे नथी. स्फटिक पोते पोतानी उज्ज्वळ अवस्था पलटीने लाल झांयनी अवस्थापणे परिणम्यो छे. लाल वासणनो संयोग छे ए तो निमित्त छे अने ते स्फटिकनी लाल झांयनी अवस्थानो कर्ता नथी. पोतानी लाल झांयनी अवस्थानो कर्ता स्फटिक पोते छे. तेवी ज रीते जीवना विकारनो कर्ता दर्शनमोहकर्म नथी. दर्शनमोहकर्म तो निमित्तमात्र छे. जीवना विकारनो कर्ता निश्चयथी विकार पोते छे. (अने अभेदथी कहीए तो जीव पोते छे).