Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ८९ ] [ २८३

लोढाना सळियानी उष्ण अवस्था थाय छे तेनो कर्ता लोढानी पर्याय छे (अभेदथी कहेतां ते द्रव्य छे), पण अग्नि एनो कर्ता नथी. आ विषयो-रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द-ते सुखदुःख थवामां निमित्त छे पण ते कांई सुखदुःख ऊपजावतां नथी. प्रवचनसार गाथा ६६मां कह्युं छे के-“एकांते अर्थात् नियमथी स्वर्गमां पण देह देहीने (आत्माने) सुख करतो नथी; परंतु विषयोना वशे सुख अथवा दुःखरूप स्वयं आत्मा थाय छे.” स्वर्गमां जे सुख थाय छे ते सुखनो कर्ता देह नथी. देह सुखमां निमित्त छे. एनो अर्थ शुं? के सुखनी जे कल्पना थई ते सुंदर वैक्रियक देहना कारणे थई नथी. ते सुखनी कल्पनानो कर्ता ते ते परिणति छे. अहो! दिगंबर मुनिओ द्वारा रचायेलां शास्त्रोमां परम सत्यनुं निरूपण थयेलुं छे. भाई! आ सर्वज्ञनी वाणी छे. वाणीनी पर्याय निश्चयथी वाणीनी कर्ता छे, वाणीना कर्ता सर्वज्ञ नथी; निमित्त हो; पण निमित्त उपादानना कार्यमां अकिंचित्कर छे.

अन्यवस्तुभूत मोहना संयोगथी जीवमां विकारपरिणाम थाय छे. जडकर्म मिथ्यादर्शन एटले दर्शनमोह, अज्ञान एटले ज्ञानावरणीय कर्म अने अविरति नाम चारित्रमोहनीय कर्म- ते जेनो स्वभाव छे एवा अन्यवस्तुभूत मोहना संयोगथी-निमित्तथी आत्माना उपयोगमां मिथ्याद्रर्शन, अज्ञान अने अविरति एवा त्रण प्रकारना विकारपरिणाम थाय छे. ९०मी गाथामां विशेष खुलासो करशे.

केवळज्ञानमां लोकालोक निमित्त छे; एटले शुं लोकालोक केवळज्ञाननुं कर्ता छे? बीलकुल नहि. वळी केवळज्ञान लोकालोकने निमित्त छे; तो शुं केवळज्ञान लोकालोकनुं कर्ता छे? नहि; बीलकुल नहि.

सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप शुद्धरत्नत्रयना परिणाम ते निश्चय मोक्षमार्ग छे अने ते ज यथार्थ मोक्षमार्ग छे. पण साथे व्यवहाररत्नत्रयनो जे राग छे तेने सहचर वा निमित्त देखीने उपचारथी मोक्षमार्ग कहेवामां आव्यो. आ वात मोक्षमार्गप्रकाशकना सातमा अधिकारमां कही छे. व्यवहाररत्नत्रयने निमित्त देखीने आरोपथी मोक्षमार्ग कह्यो छे. पण ते निमित्त छे ते निश्चय मोक्षमार्गनुं कर्ता छे एम नथी. व्यवहाररत्नत्रय छे ते शुद्धरत्नत्रयनुं कर्ता नथी.

आ लाकडी ऊंची थाय तेमां आंगळी निमित्त छे, पण लाकडी जे ऊंची थई ते क्रियानो आंगळी कर्ता नथी. आ भाषा जे बोलाय छे तेमां जीवनां राग अने ज्ञान निमित्त छे; पण ते राग अने ज्ञान भाषानी पर्यायना कर्ता नथी. त्रणेकाळ निमित्त अने उपादाननी स्वतंत्रता छे एवो आ स्पष्ट खुलासा भर्यो ढंढेरो छे.

* गाथा ८९ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘आत्माना उपयोगमां आ त्रण प्रकारनो परिणामविकार अनादि कर्मना निमित्तथी छे.’ आत्मवस्तु स्वभावथी तो त्रिकाळ शुद्ध छे. पण तेनी अवस्थामां अनादिथी विकार