२८२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
परपदार्थो जीवने राग थवामां अकिंचित्कर छे. पांच इन्द्रियना विषयो जीवने राग उत्पन्न करावता नथी. गाळना शब्दो काने पडया माटे द्वेष उत्पन्न थयो अने कोईए प्रशंसा करी माटे हरख थयो ए वात बीलकुल नथी. मैसूब अने रसगुल्लां खावानो राग थयो तेमां मैसूब तथा रसगुल्लां राग थवामां अकिंचित्कर छे. राग थवामां विषयो बीलकुल कारण नथी.
त्यां प्रवचनसार गाथा ६७ना भावार्थमां कह्युं छे के-“संसारमां के मोक्षमां आत्मा पोतानी मेळे ज सुखरूप परिणमे छे; तेमां विषयो अकिंचित्कर छे अर्थात् कांई करता नथी. अज्ञानीओ विषयोने सुखनां कारण मानीने नकामा तेमने अवलंबे छे!” स्त्री रागनो विषय छे; ते विषय तेना प्रत्ये राग थवामां अकिंचित्कर छे. स्त्रीनुं कोमळ शरीर देखीने राग थयो एमां स्त्रीनुं शरीर अकिंचित्कर छे. निमित्तने अकिंचित्कर कहेवामां आव्युं छे.
समयसार कळश २२१मां एम कह्युं छे के-“जेओ रागनी उत्पत्तिमां परद्रव्यनुं ज निमित्तपणुं (कारणपणुं) माने छे, (पोतानुं कांई कारणपणुं मानता नथी) तेओ-जेमनी बुद्धि शुद्धज्ञानरहित अंध छे एवा (अर्थात् जेमनी बुद्धि शुद्धनयना विषयभूत शुद्ध आत्मस्वरूपना ज्ञानथी रहित अंध छे एवा)-मोहनदीने पार ऊतरी शकता नथी.” जीवने राग पोताना कारणे थाय छे. एमां परवस्तु अकिंचित्कर छे. शेरडीनो रस देखीने ते संबंधी जे राग थयो ते पोताथी स्वतंत्रपणे थयो छे, रसना कारणे नहि. स्फटिकनी स्वच्छतानो, काळो, लीलो अने पीळो एम त्रण प्रकारनो परिणामविकार देखाय छे त्यां तमाल, केळ, अने कांचनना पात्ररूपी आधारनो जे संयोग छे ते निमित्त छे; पण ते निमित्तकर्ता नथी. काळी झांय देखाय छे ते तमालना कारणे नथी. आ द्रष्टांत प्रमाणे हवे सिद्ध कहे छे-
‘तेवी रीते (आत्माने) अनादिथी मिथ्यादर्शन, अज्ञान अने अविरति जेनो स्वभाव छे एवा अन्यवस्तुभूत मोहनो संयोग होवाथी, आत्माना उपयोगनो, मिथ्यादर्शन, अज्ञान अने अविरति एम त्रण प्रकारनो परिणामविकार देखवो.’
जुओ, मिथ्यादर्शन, अज्ञान, अविरति छे ते अन्यवस्तुभूत मोहनो स्वभाव छे; ते मोहनो संयोग एटले निमित्त होवाथी आत्मामां मिथ्यादर्शन आदि परिणाम थाय छे. संयोग निमित्त छे पण संयोगना कारणे मिथ्यात्वादि विकारपरिणाम थाय छे एम नथी. जेम स्फटिकमां काळी, लीली, पीळी झांय देखाय छे ते वासणना कारणे नथी; वासण तो निमित्त छे, निमित्तकर्ता नथी. स्फटिकमां जे काळी, लीली, पीळी झांय देखाय छे ते स्फटिकनी पर्यायनी योग्यताथी थई छे, वासणे करी छे एम नथी. तेम जीवमां थता मिथ्यात्वादि भावो जीवनी पर्यायनी योग्यताथी थया छे, जड मोहकर्मे कर्या छे एम नथी. जडमोह तो निमित्त छे बस.