१४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प रागद्वेषनुं कारण नथी, केमके परचीज तो ज्ञेय छे. तेमने अनुकूळ-प्रतिकूळ जाणी स्वयं रागद्वेषपणे परिणमे छे. वीतरागनो मार्ग सूक्ष्म छे, भाई!
आ आत्मा आनंदनो नाथ नित्यानंद प्रभु सहजानंद परमानंद सदानंदस्वरूप छे. एवी पोतानी चीजनी अंतरमां द्रष्टि थतां अनुभवमां जे अतीन्द्रिय निराकुळ आनंद आव्यो ते आनंद सम्यक्द्रष्टिना अनुभवनी महोर-छाप छे. अतीन्द्रिय आनंद ए स्वानुभवनो ट्रेडमार्क छे. सम्यक्द्रष्टि आनंदनी दशानुं वेदन करे छे. तेने जे राग आवे तेने ते जाणे छे पण द्रष्टिना सामर्थ्यथी तेनो ए कर्ता अने भोक्ता थतो नथी. अहो! सम्यग्दर्शन अलौकिक छे!
धर्मीने शुभराग आवे छे, पण धर्मी रागने दुःखरूप हेय जाणे छे. अज्ञानी रागने पोतानुं कर्तव्य अने एनाथी पोताने सुख थवानुं माने छे. बेनी मान्यतामां आसमान- जमीननो फेर छे. तेथी अज्ञानी विकारना कर्तापणे परिणमे छे, तो ज्ञानी विकारना कर्तापणे परिणमता नथी. अहो! शुं द्रष्टिनुं माहात्म्य!
अहीं कह्युं के-साधक मंत्रनो कर्ता छे, पण जे स्त्रीओ स्वयमेव विडंबना पामे छे के जे सर्पनुं झेर उतरी जाय छे-इत्यादि ते बधी परद्रव्यनी क्रियानो साधक कर्ता नथी. एम देव-गुरु- शास्त्रनी श्रद्धानो राग, पंचमहाव्रतना परिणाम, शास्त्रनुं ज्ञान ए बधां निमित्त हो, पण ए निमित्त आत्माने जे सम्यग्दर्शन थाय एना कर्ता नथी. जेम निमित्त परनो कर्ता नथी तेम व्यवहाररत्नत्रय निश्चयरत्नत्रयना कर्ता नथी.
अहा! जगतना जीवोमां मिथ्याश्रद्धानां शल्य पडयां छे ने माने छे के अमे धर्म करीए छीए!
अहीं कहे छे-‘जीवना भावो निमित्तमात्र थतां, पुद्गलद्रव्य पोते पोताना भावथी ज कर्मरूपे परिणमे छे. परस्पर निमित्त-नैमित्तिकभाव मात्र छे. कर्ता तो बन्ने पोतपोताना भावना छे. ए निश्चय छे.’