समयसार गाथा-९१ ] [ १३
कोई कहे छे के आ तो एकान्त छे. तेने कहे छे-सांभळ, भाई! आ सम्यक् एकान्त छे. जडनी पर्याय जडथी स्वतंत्रपणे थाय छे, तेनो कर्ता आत्मा नथी. जेटला प्रमाणमां जीव रागद्वेष करे छे तेटला प्रमाणमां त्यां चारित्रमोहकर्म बंधाय छे. छतां रागद्वेषना जे परिणाम थाय छे ते चारित्रमोहकर्मना बंधना कर्ता नथी. अहीं कह्युं छे ने के जीवना मिथ्यादर्शनादि भाव पुद्गलद्रव्यने कर्मरूपे परिणमवामां अनुकूळ होवाथी निमित्तमात्र थतां, आत्मा तेनो कर्ता थया सिवाय पुद्गलद्रव्य स्वयमेव मोहनीयादि कर्मपणे परिणमे छे. मोहनीयरूपे कर्मनी पर्याय थाय तेनो आत्मा कर्ता नथी. आत्मा जड कर्मनो कर्ता नथी. कर्मनी पर्याय पोताना कर्ता गुणथी पोतानी कर्मपरिणतिनो कर्ता थाय छे.
‘आत्मा तो अज्ञानरूप परिणमे छे, कोई साथे ममत्व करे छे, कोई साथे राग करे छे, कोई साथे द्वेष करे छे; ते भावोनो पोते कर्ता थाय छे.’ अहीं अज्ञानीनी वात छे. सम्यग्द्रष्टि रागनो कर्ता नथी. नाटक समयसारमां आवे छे ने के-
दया, दान, व्रत आदि शुभभावनो जे कर्ता थाय ते मिथ्याद्रष्टि छे. ज्ञानी तो शुभभावनो जाणनहारो छे. आत्मा स्वभावे ज्ञाननो कंद प्रभु छे. माटे आत्मा जाणवानुं काम करे. रागनुं काम थाय तेनो ज्ञानी कर्ता नथी. समकितीने चोथे गुणस्थाने जे राग थाय तेनो ते जाणनार छे, कर्ता नथी. आत्मानी शक्तिओ सर्व शुद्ध छे. धर्मीनी द्रष्टि शुद्ध शक्तिवान चैतन्यघन प्रभु आत्मा उपर छे. तेथी जे आ रागादि विकार थाय तेनो ए जाणनार छे, कर्ता नथी. तेने रागनुं परिणमन छे ए अपेक्षाथी कर्ता कहेवामां आवे छे. परंतु शुद्ध द्रष्टिनी अपेक्षाए ज्ञानी रागनो कर्ता नथी.
अहो! आवुं सत्य निरूपण एक दिगंबरमां ज छे, बीजे कयांय नथी. वेदांत आदि आत्माने सर्वव्यापक कहे छे अने भूलने मायाजाळ माने छे. पण एम नथी. मायाजाळ पण वस्तु छे अने तेने पोतानी माने ते मूढ छे.
आत्मा रागना कर्तापणे परिणमे ते अज्ञानभाव छे. ते अज्ञानवश कोई साथे ममत्व- मिथ्यात्वनो भाव करे छे, कोई साथे राग करे छे, कोई साथे द्वेष करे छे. ते ते भावोनो ते स्वयं कर्ता थाय छे. मारी लक्ष्मी, मारुं मकान, मारुं सोनुं-झवेरात, मारो पुत्र, मारी आबरू इत्यादि माने ते ममता-मिथ्यात्व छे. अने ते बाह्य पदार्थो ने देखी तेमने अनुकूळ-प्रतिकूळ जाणी तेमां प्रीति-अप्रीति करे ते रागद्वेष छे. त्यां ए बाह्य चीज