१२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प कहेवामां आवे छे. ज्ञानीने पोताना ज्ञाता-द्रष्टास्वभावनुं भान थयुं छे. तेने जे राग छे ते ज्ञाननी पर्यायमां निमित्त छे. ज्ञाननी जाणवानी पर्यायनुं उपादान ते पर्याय पोते छे, तेमां राग निमित्त छे. ज्ञानीने ज्ञाननी स्वपरप्रकाशक पर्याय पोताथी थाय छे. ते पर्यायमां राग निमित्त छे, पण राग निमित्त छे माटे त्यां ज्ञाननी पर्याय थई छे एम नथी. राग कर्ता थया सिवाय, ज्ञान स्वयं ज्ञानरूपे परिणमे छे.
जेने शुद्ध चिदानंद चैतन्यमय प्रभु आत्मानी द्रष्टि करतां सम्यग्दर्शन प्रगट थयुं छे, आनंदनो स्वाद आव्यो छे ए ज्ञानीने राग आवे छे. पण ते रागनो ज्ञानी कर्ता नथी. राग ए ज्ञानीनुं कर्तव्य नथी केमके राग करवा लायक छे एम ते मानतो नथी. तथापि परिणमन छे ए अपेक्षाए तेने कर्ता कहेवामां आवे छे. प्रवचनसारमां ४७ नयना अधिकारमां आवे छे के-जेम रंगरेज रंगनो कर्ता छे तेम ज्ञानी परिणमननी अपेक्षाए रागनो कर्ता छे. करवा लायक छे एम नहि, पण परिणमन छे ए अपेक्षाए कर्ता कहेवाय छे.
पोतानी कमजोरीथी ज्ञानीने राग आवे छे. ते रागना काळे ज्ञाननी स्वपरप्रकाशक पर्याय पोताथी प्रगट थाय छे. द्रव्यनुं ज्ञान पर्यायमां आवे ते स्वप्रकाशक अने पर-राग संबंधी पोतानुं ज्ञान पोताथी पर्यायमां थाय ते परप्रकाशक. त्यां रागथी ज्ञाननी स्वपर-प्रकाशक पर्याय थई छे एम नथी. स्वपरप्रकाशक ज्ञाननी पर्याय तो पोताथी थई छे, तेमां राग निमित्त छे. ज्ञाननी जे परिणति प्रगट थई तेनो कर्ता पोतानो आत्मा छे, तेमां राग निमित्त छे, निमित्तकर्ता नहि. आवो वीतरागनो मार्ग अति सूक्ष्म छे.
अहीं कहे छे-जेम मंत्रसाधक पोताना ध्याननो कर्ता थाय छे अने ते ध्यानभाव सर्व साध्यभावोने अनुकूळ होवाथी निमित्तभूत थतां, साधक कर्ता थया सिवाय सर्पादिकनुं व्यापेलुं झेर स्वयमेव उतरी जाय छे; ‘तेवी रीते आ आत्मा अज्ञानने लीधे मिथ्या-दर्शनादिभावे पोते ज परिणमतो थको मिथ्यादर्शनादिभावनो कर्ता थाय छे अने ते मिथ्यादर्शनादिभाव पुद्गलद्रव्यने (कर्मरूपे परिणमवामां) अनुकूळ होवाथी निमित्तमात्र थतां, आत्मा कर्ता थया सिवाय पुद्गलद्रव्य मोहनीयादि कर्मपणे स्वयमेव परिणमे छे.’
आत्मा पोतामां जे राग थाय छे तेनो कर्ता छे. ते समये समीपमां जे कार्मण-वर्गणा छे ते स्वयं जड कर्मपणे परिणमे छे. ते कर्मपरिणामनो राग कर्ता नथी. नजीकमां एकक्षेत्रावगाह रहेली पुद्गलकर्मवर्गणा जड कर्मपणे परिणमे तेनो जो आत्मा कर्ता नथी तो आत्मा परनो- मकानादिनो कर्ता थाय ए वात प्रभु! कयां रही?
कर्ता, कर्म, करण, संप्रदान, अपादान, अधिकरण-एम छ शक्तिओ परमाणु आदि छए द्रव्योमां छे. भगवान कहे छे के प्रत्येक द्रव्यमां षट्कारकरूप शक्तिओ पडी छे. ए शक्तिओ पोताथी पोतानुं कार्य करे छे, परने लईने कोईनुं कार्य थतुं नथी.