समयसार गाथा-९१ ] [ ११ रत्नत्रय निमित्त छे, पण व्यवहाररत्नत्रय निश्चयरत्नत्रयनुं कर्ता नथी. अहीं कह्युं ने के व्यवहाररत्नत्रय कर्ता थया सिवाय जीव स्वयं निश्चयरत्नत्रयपणे स्वभावना लक्षे परिणमे छे. ज्यां व्यवहाररत्नत्रयने मोक्षनुं परंपराकारण कह्युं होय त्यां ते उपचारथी कथन कर्युं छे एम समजवुं अने ते पण ज्ञानीना संदर्भमां वात छे. अज्ञानीना शुभरागमां तो परंपरा-कारणनो अरोप पण आवतो नथी.
अज्ञानीने व्यवहार होतो नथी. अज्ञानीने तो व्यवहारमूढ कह्यो छे. समयसार गाथा ४१३मां त्रण शब्द कह्या छे-अनादिरूढ, व्यवहारमां मूढ, निश्चय पर अनारूढ वर्तता थका परमार्थसत्य भगवान समयसारने देखता-अनुभवता नथी. ‘‘हुं श्रमण छुं, हुं श्रमणोपासक छुं एम द्रव्यलिंगमां ममकार वडे मिथ्या अहंकार करे छे, तेओ अनादिरूढ, व्यवहारमां मूढ, प्रौढ विवेकवाळा निश्चय पर अनारूढ वर्तता थका परमार्थ-सत्य भगवान समयसारने देखता- अनुभवता नथी.’’ अरे भाई! रागनी मंदता तो जीव अनादिथी करतो आव्यो छे, एमां कांई नवुं नथी. सम्यग्दर्शन विना कथनमात्र व्यवहाररत्नत्रयनुं जीवे अनंतवार पालन कर्युं छे. नियमसार कळश १२१मां कह्युं छे के-जे कथनमात्र व्यवहाररत्नत्रय छे तेने भवमां डूबेला जीवे अनंतवार आचर्युं छे, परंतु अरेरे! ज्ञानस्वरूप जे एक परमात्मतत्त्व छे एनुं आचरण कर्युं नथी. सम्यग्दर्शन विना भेदज्ञानरहित व्यवहारमां जे लीन छे ते व्यवहारमूढ छे. सम्यग्दर्शन प्रगट थतां ज्ञानीने जे व्यवहार आवे छे तेनो ते ज्ञाता थाय छे, कर्ता थतो नथी.
त्यां गाथा ४१३ना भावार्थमां स्पष्ट कर्युं छे के-‘‘अनादि काळनो परद्रव्यना संयोगथी थयेलो जे व्यवहार तेमां ज जे पुरुषो मूढ अर्थात् मोहित छे, तेओ एम माने छे के-‘आ बाह्य महाव्रतादिरूप भेख छे ते ज अमने मोक्ष प्राप्त करावशे,’ परंतु जेनाथी भेदज्ञान थाय छे एवा निश्चयने तेओ जाणता नथी. आवा पुरुषो सत्यार्थ, परमात्मरूप, शुद्धज्ञानमय समयसारने देखता नथी.’’ आ प्रमाणे अज्ञानीनो व्यवहार निष्फळ छे, निरर्थक छे. ज्यारे ज्ञानी निश्चय पर आरूढ छे; ते व्यवहारमां मूढ नथी पण व्यवहारना ज्ञाताद्रष्टा छे. जेने आत्मज्ञाननी दशा प्रगट अनुभवमां आवी छे तेवा पंचमगुणस्थानवाळा अने छठ्ठा गुणस्थानवाळा ज्ञानीने शुभभावना काळमां अशुभ टळे छे तेथी तेना शुभरागने व्यवहार कहेलो छे. पण ते व्यवहार ते कांई निश्चयनुं वास्तविक साधन नथी. बाह्य निमित्त हो, पण ते निश्चयनो कर्ता नथी. ज्यां एने साधन कह्युं छे ते उपचारथी कह्युं छे-एम समजवुं.
जड अने चेतननी पर्याय थाय ते वखते ज्ञानीनी त्यां उपस्थिति (बाह्य व्याप्ति) होय तो ज्ञानी तेमां निमित्त कहेवामां आवे छे, निमित्तकर्ता नहि. निमित्त अने निमित्त-कर्तामां फेर छे. अज्ञानी मिथ्याद्रष्टि जीव जे रागद्वेषनो कर्ता थाय छे तेनो राग, भोग आदि जे क्रिया थाय तेनो निमित्तकर्ता कहेवामां आवे छे. मिथ्याद्रष्टिने निमित्तकर्ता