१० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प
भगवान आत्मानो स्वभाव तो ज्ञाताद्रष्टा छे. शुद्ध निरंजन सदा परमानंदस्वरूप भगवान आत्मा अंतर्द्रष्टिनो विषय छे. परंतु तेनी द्रष्टि छोडीने जे पर्याय उपर द्रष्टि मांडे छे ते जीव मिथ्यात्व अने पुण्यपापना भावनो कर्ता थाय छे. अने त्यारे आत्माना ते मिथ्यात्वादि भाव निमित्तभूत थतां पुद्गलद्रव्य कर्मपणे स्वयमेव परिणमे छे. जीवे मिथ्यात्वना परिणाम कर्या माटे त्यां कर्मनी पर्याय दर्शनमोहपणे थई एम नथी. अरे भाई! निमित्त- नैमित्तिकसंबंधनो अर्थ कर्ताकर्म नथी. अज्ञानी जीव विकारनो कर्ता थाय छे त्यां पुद्गलकर्म पोतानी मेळे कर्मरूपे परिणमे छे. आवी स्वतंत्रतानी वात छे. आ वात स्पष्टपणे समजाववामां आवे छे-
‘जेम साधक ते प्रकारना ध्यानभावे पोते ज परिणमतो थको ध्याननो कर्ता थाय छे अने ते ध्यानभाव सर्व साध्यभावोने (साधकने साधवायोग्य भावोने) अनुकूळ होवाथी निमित्तभूत थतां, साधक कर्ता थया सिवाय (सर्पादिकनुं) व्यापेलुं झेर स्वयमेव उतरी जाय छे, स्त्रीओ स्वयमेव विडंबना पामे छे अने बंधनो स्वयमेव तूटी जाय छे.’
जुओ, मंत्रसाधक पोतानी मंत्रसाधनानी-ध्याननी पर्यायनो कर्ता छे, पण जे बीजाने झेर उतरी जाय ते क्रियानो ए कर्ता नथी. कह्युं ने के-तेमां साधकनुं ध्यान अनुकूळ होवाथी निमित्तभूत थतां, साधक कर्ता थया सिवाय सर्पादिकनुं झेर स्वयमेव उतरी जाय छे. अहाहा...! परमां जे परिणति थई ते मंत्रसाधकथी थई नथी. मंत्रसाधकनुं ध्यान निमित्तभूत थतां, ते कर्ता थया सिवाय स्त्रीओ स्वयमेव विडंबना पामे छे. आ स्त्रीओ जे धूणे छे ए धूणवानी अवस्था पोतानी पोताथी छे, एमां मंत्रसाधकनुं कांई कार्य नथी. ए परनी धूणवानी क्रियानो कर्ता मंत्रसाधक नथी. छे ने के स्त्रीओ स्वयमेव विडंबना पामे छे. तेवी ज रीते साधकनुं ध्यान निमित्तभूत थतां बंधनो, साधक कर्ता थया सिवाय, स्वयमेव तूटी जाय छे.
मंत्रनो साधक पोतानी साधनानी पर्यायनो कर्ता छे, पण ते परनी (नैमित्तिक) परिणतिनो कर्ता नथी. अरे! बहु गडबड चाले छे, अत्यारे तो एम माने छे के ज्ञानावरणीय कर्म जीवनुं ज्ञान रोके छे अने चारित्रमोहना उदयथी जीवने राग थाय छे अने व्यवहारथी निश्चय थाय छे इत्यादि. पण एम छे नहि. अहीं तो कहे छे के ज्ञानावरणीय कर्म कर्ता थया सिवाय जीवनी ज्ञाननी हीणी दशा स्वयमेव थाय छे. बहु झीणी वात छे, भाई!
व्यवहार छे ते निश्चयनो कर्ता नथी. चैतन्यस्वभाव उपर द्रष्टि देतां सहजानंद-स्वरूप भगवान आत्मानो अनुभव थईने जे सम्यग्दर्शननी पर्याय प्रगट थाय छे तेनो कर्ता आत्मा छे. खरेखर तो ते निर्मळ पर्यायनो कर्ता पर्याय पोते छे, पण पर्यायनो आत्मा साथे (अभेदपणानो) संबंध गणीने सम्यग्दर्शननी पर्यायनो आत्मा कर्ता कहेवामां आवे छे. परंतु ते सम्यग्दर्शननी पर्यायनो कर्ता व्यवहार समकित नथी. निश्चयरत्नत्रयमां व्यवहार-