समयसार गाथा-९१ ] [ ९ साथे राग करे छे, कोई साथे द्वेष करे छे; ते भावोनो पोते कर्ता थाय छे. ते भावो निमित्तमात्र थतां, पुद्गलद्रव्य पोते पोताना भावथी ज कर्मरूपे परिणमे छे. परस्पर निमित्तनैमित्तिकभाव मात्र छे. कर्ता तो बन्ने पोत पोताना भावना छे ए निश्चय छे.
हवे, आत्माने त्रण प्रकारना विकारनुं कर्तापणुं होय त्यारे पुद्गलद्रव्य पोतानी मेळे ज कर्मपणे परिणमे छे एम कहे छेः-
‘आत्मा पोते ज ते प्रकारे परिणमवाथी जे भावने खरेखर करे छे तेनो ते कर्ता थाय छे-साधकनी (अर्थात् मंत्र साधनारनी) जेम; ते (आत्मानो भाव) निमित्तभूत थतां, पुद्गलद्रव्य कर्मपणे स्वयमेव (पोतानी मेळे ज) परिणमे छे.’
आत्मा पोते ज मिथ्याश्रद्धा, मिथ्याज्ञान अने मिथ्याचारित्ररूप परिणमवाथी जे भावने करे छे तेनो ते कर्ता थाय छे. कर्मनो उदय छे तो रागादिरूपे परिणमे छे एम नथी. पुण्यथी धर्म थाय, व्यवहारथी निश्चय थाय, निमित्त छे ते कर्ता छे-इत्यादि मिथ्याश्रद्धारूप आत्मा स्वयं परिणमे छे; कर्म तेने परिणमावे छे एम नथी. भगवान आत्मा पोतानी चीजने भूलीने पोते ज-‘आत्मा हि’ छे ने-मिथ्यात्व, रागद्वेष आदि जे भावने करे छे ते भावनो ते कर्ता थाय छे. मंत्र साधनार साधकनी जेम अज्ञानी पोताना भावनो कर्ता छे. केटलुं स्पष्ट छे! आत्मानो ते भाव निमित्तभूत थतां पुद्गल-द्रव्य स्वयमेव कर्मपणे परिणमे छे.
आत्मा मिथ्यात्वादि विकाररूपे पोताथी थाय छे. विकारभावनो पोते कर्ता अने विकारभाव ते एनुं कर्म छे. विकारनो कर्ता, निमित्त-कर्म (निमित्तपणे रहेलुं कर्म) छे एम त्रणकाळमां छे नहि. जीव चारगतिमां रखडे छे ते पोताना कारणे रखडे छे, कर्मना कारणे नहि. कर्म तो जड छे, परद्रव्य छे. कर्म जीवने हेरान करे छे ए वात यथार्थ नथी.
स्वभावनुं भान नथी त्यांसुधी मिथ्याद्रष्टि मिथ्यात्वभावनो कर्ता छे. आत्मानो ते भाव निमित्तभूत थतां पुद्गलद्रव्य स्वयमेव कर्मपणे परिणमे छे. ‘स्वयमेव’ परिणमे छे-छे स्पष्ट. आत्माना परिणाम निमित्तभूत थतां जे जडकर्म बंधाय ते पोताथी बंधाय छे. ते जडनी पर्याय जडथी थाय छे; आत्मा कर्मनी अवस्थानो कर्ता नथी. कर्म बंधाय तेमां जीवनो विकारी भाव निमित्त होवा छतां पुद्गलद्रव्य स्वयमेव कर्मपणे परिणमे छे. जीव एने कर्मपणे परिणमावे छे एम नथी. जीवे रागद्वेष कर्या माटे कर्मने बंधावुं पडयुं एम नथी.