Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 91.

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गाथा–९१

अथात्मनस्त्रिविधपरिणामविकारकर्तृत्वे सति पुद्गलद्रव्यं स्वत एव कर्मत्वेन परिणमतीत्याह–

जं कुणदि भावमादा कत्ता सो होदि तस्स भावस्स।
कम्मत्तं परिणमदे तम्हि सयं पोग्गलं दव्वं।। ९१ ।।
यं करोति भावमात्मा कर्ता स भवति तस्य भावस्य।
कर्मत्वं परिणमते तस्मिन् स्वयं पुद्गलं द्रव्यम्।। ९१ ।।

हवे, आत्माने त्रण प्रकारना परिणामविकारनुं कर्तापणुं होय त्यारे पुद्गलद्रव्य पोतानी मेळे ज कर्मपणे परिणमे छे एम कहे छेः-

जे भाव जीव करे अरे! जीव तेहनो कर्ता बने;
कर्ता थतां, पुद्गल स्वयं त्यां कर्मरूपे परिणमे. ९१.

गाथार्थः– [आत्मा] आत्मा [यं भावम्] जे भावने [करोति] करे छे [तस्य भावस्य] ते भावनो [सः] ते [कर्ता] कर्ता [भवति] थाय छे; [तस्मिन्] ते कर्ता थतां [पुद्गलं द्रव्यम्] पुद्गलद्रव्य [स्वयं] पोतानी मेळे [कर्मत्वं] कर्मपणे [परिणमते] परिणमे छे.

टीकाः– आत्मा पोते ज ते प्रकारे (ते-रूपे) परिणमवाथी जे भावने खरेखर करे छे तेनो ते कर्ता थाय छे-साधकनी (अर्थात् मंत्र साधनारनी) जेम; ते (आत्मानो भाव) निमित्तभूत थतां, पुद्गलद्रव्य कर्मपणे स्वयमेव (पोतानी मेळे ज) परिणमे छे. आ वात स्पष्टपणे समजाववामां आवे छेः-जेम साधक ते प्रकारना ध्यानभावे पोते ज परिणमतो थको ध्याननो कर्ता थाय छे अने ते ध्यानभाव सर्व साध्यभावोने (अर्थात् साधकने साधवायोग्य भावोने) अनुकूळ होवाथी निमित्तमात्र थतां, साधक कर्ता थया सिवाय (सर्पादिकनुं) व्यापेलुं झेर स्वयमेव ऊतरी जाय छे, स्त्रीओ स्वयमेव विडंबना पामे छे अने बंधनो स्वयमेव तूटी जाय छे; तेवी रीते आ आत्मा अज्ञानने लीधे मिथ्यादर्शनादिभावे पोते ज परिणमतो थको मिथ्यादर्शनादिभावनो कर्ता थाय छे अने ते मिथ्यादर्शनादिभाव पुद्गलद्रव्यने (कर्मरूपे परिणमवामां) अनुकूळ होवाथी निमित्तमात्र थतां, आत्मा कर्ता थया सिवाय पुद्गलद्रव्य मोहनीयादि कर्मपणे स्वयमेव परिणमे छे.

भावार्थः– आत्मा तो अज्ञानरूप परिणमे छे, कोई साथे ममत्व करे छे, कोई