१६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प
उष्णपणानी माफक, पुद्गलकर्मथी अभिन्न छे अने आत्माथी अत्यंत भिन्न छे. अज्ञानने लीधे आत्माने तेनुं भेदज्ञान नहि होवाथी ते एम जाणे छे के आ स्वाद मारो ज छे; कारण के ज्ञाननी स्वच्छताने लीधे रागद्वेषादिनो स्वाद, शीतउष्णपणानी माफक, ज्ञानमां प्रतिबिंबित थतां, जाणे के ज्ञान ज रागद्वेष थई गयुं होय एवुं अज्ञानी ने भासे छे. तेथी ते एम माने छे के ‘हुं रागी छुं, हुं द्वेषी छुं, हुं क्रोधी छुं, हुं मानी छुं’ इत्यादि. आ रीते अज्ञानी जीव रागद्वेषादिनो कर्ता थाय छे.
हवे, अज्ञानथी ज कर्म उत्पन्न थाय छे एम तात्पर्य कहे छेः-
‘अज्ञानथी आ आत्मा परनो अने पोतानो परस्पर विशेष (तफावत) न जाणतो होय त्यारे परने पोतारूप करतो अने पोताने पर करतो, पोते अज्ञानमय थयो थको, कर्मोनो कर्ता प्रतिभासे छे.’
अज्ञानथी आत्मा पर एटले राग-व्यवहाररत्नत्रयनो विकल्प अने पोतानी जुदाई जाणतो नथी. एटले ते परने-रागने पोतारूप करतो अने पोताने पररूप एटले रागरूप करतो, अज्ञानमय थयो थको, कर्मोनो एटले विकारी परिणामोनो कर्ता प्रतिभासे छे. अहीं जडकर्मोनी वात नथी. ते स्पष्टताथी समजाववामां आवे छेः-
‘जेम शीत-उष्णनो अनुभव कराववामां समर्थ एवी शीत-उष्ण पुद्गलपरिणामनी अवस्था पुद्गलथी अभिन्नपणाने लीधे आत्माथी सदाय अत्यंत भिन्न छे अने तेना निमित्ते थतो ते प्रकारनो अनुभव आत्माथी अभिन्नपणाने लीधे पुद्गलथी सदाय अत्यंत भिन्न छे.’
शुं कहे छे? ठंडी अने गरम ए पुद्गलनी जडनी अवस्था छे. ते अवस्था पुद्गलथी अभिन्न छे अने आत्माथी सदाय अत्यंत भिन्न छे. ठंडी अने गरम अवस्था भगवान आत्माथी अत्यंत भिन्न छे. आत्मा कदीय ठंडो के गरम थतो नथी. आ मरचु खाय त्यारे तीखाशरूपे आत्मा थतो नथी. तीखो स्वाद ए तो जडनी पर्याय छे. अज्ञानी माने छे के हुं तीखाशरूपे थई गयो, पण आत्मा तीखा रसपणे थतो नथी. ठंडी अने गरम अवस्था पुद्गलथी अभिन्नपणाने लीधे आत्माथी भिन्न छे. परंतु ठंडी अने गरम अवस्थानुं ज्ञान पोतामां-आत्मामां थाय छे. ए ज्ञानथी अभिन्न छे. ठंडी अने गरम अवस्थानुं जे ज्ञान थाय एनाथी आत्मा अभिन्न छे अने ते ज्ञान पुद्गलथी सदाय भिन्न छे.