Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-९२ ] [ १७

आ द्रष्टांत कह्युं. हवे सिद्धांत कहे छे-‘तेवी रीते ते प्रकारनो अनुभव कराववामां समर्थ एवी राग-द्वेष-सुख-दुःखादिरूप पुद्गलपरिणामनी अवस्था पुद्गलथी अभिन्नपणाने लीधे आत्माथी सदाय अत्यंत भिन्न छे अने तेना निमित्ते थतो ते प्रकारनो अनुभव आत्माथी अभिन्नपणाने लीधे पुद्गलथी सदाय अत्यंत भिन्न छे.’

दया, दान, व्रत, भक्ति आदिना परिणाम ते पुद्गलपरिणाम छे. जेम शीत-उष्ण पुद्गलना परिणाम छे तेम पुण्य अने पाप, दया अने दान, व्रत अने भक्ति, काम अने क्रोध इत्यादि भाव बधा पुद्गलना परिणाम छे. पहेलां गाथा ९१मां रागद्वेषादि भावनो कर्ता अज्ञानभावे आत्मा छे एम कह्युं अने अहीं ए परिणाम जडमां नाखी दीधा. अहीं तो विभावने स्वभावथी भिन्न करवो छे ने! रागादिभाव जीवना स्वभावमां तो नथी अने परसंगे पुद्गलना निमित्ते उत्पन्न थयेला छे तेथी ते पुद्गलना परिणाम छे एम कह्युं छे. परना संगमां ऊभा रहीने उत्पन्न थयेला परिणाम परना ज-पुद्गलना ज छे एम अहीं वात छे. ते राग-द्वेष-सुख-दुःख आदि परिणाम जीवने ज्ञान कराववामां समर्थ एटले निमित्त छे. ज्ञान तो आत्मा पोते पोताथी करे छे. ज्ञानमां स्व-परने प्रकाशवानुं सहज सामर्थ्य छे. तेथी स्व-परनुं ज्ञान करनारो जीव पोते छे अने ते ज्ञानमां रागद्वेषादि पर पदार्थ निमित्त छे. एटले रागादिने जाणनारी ज्ञाननी अवस्था पोताथी थई छे, रागादिथी थई छे एम नथी.

भाई! खूब शांति अने धीरज केळवी सांभळवा जेवी आ सूक्ष्म वात छे. शीत-उष्ण अवस्था पुद्गलथी अभिन्न छे. ते शीत-उष्ण अवस्था ज्ञानमां निमित्त छे. शीत-उष्ण अवस्था ज्ञाननी पर्यायनी कर्ता नथी, अने ज्ञाननी पर्याय शीत-उष्ण अवस्थानी कर्ता नथी. तेम भगवान आत्मामां दया, दान, व्रत, भक्तिना परिणाम तथा हिंसा, जूठ, चोरी आदिना परिणाम अने सुख-दुःखनी जे कल्पना थाय ते सघळा पुद्गलना परिणाम छे; केमके ते शुद्ध चैतन्यनी-आत्माथी जात नथी. पुण्य-पापना पुद्गलपरिणाम ते पुद्गलथी अभिन्न छे अने आत्माथी ते परिणाम सदाय भिन्न छे. अने तेना निमित्ते थतो ते प्रकारनो अनुभव एटले ज्ञान आत्माथी अभिन्नपणाने लीधे पुद्गलथी सदाय अत्यंत भिन्न छे.

भगवान आत्मा शुद्ध चैतन्यमय प्रभु आनंदनो नाथ छे. तेना द्रव्य-गुणमां तो राग नथी. पर्यायमां जे राग थाय छे तेने अहीं पुद्गलना परिणाममां नाख्या छे. निमित्तने आधीन थतां जे दया, दान, काम, क्रोधादि शुभाशुभ भाव थाय ते पुद्गलना परिणाम छे. ते पुद्गलथी अभिन्न-एकमेक छे. आत्माथी ते परिणाम अत्यंत भिन्न छे. अज्ञानी पुण्य-पाप आदि भावोनो अज्ञानभावे कर्ता छे, पण ज्ञान थतां ज्ञानी ते पुद्गलपरिणामनो कर्ता नथी एम अहीं सिद्ध करवुं छे. राग अने ज्ञाननुं भेदज्ञान