Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प अहीं कराववुं छे. राग-द्वेषना परिणाम ज्ञान थवामां निमित्त छे पण रागद्वेषना परिणाम ते जीवनुं कार्य नथी. आत्मा रागद्वेषनो कर्ता थाय एवी कोई शक्ति आत्मामां नथी.

रागद्वेषादि परिणाम जीवनी-चैतन्यनी जातिना नथी माटे तेने पुद्गलना परिणाम कह्या छे. ७२मी गाथामां तेने अचेतन जड कह्या छे. त्यां गाथा ७२मां कह्युं छे के-शुभाशुभ परिणाम अशुचि छे, भगवान आत्मा अत्यंत शुचि छे; पुण्य-पापना भाव जड छे, भगवान आत्मा शुद्ध विज्ञानघन छे; पुण्य-पापना भाव दुःखरूप छे, भगवान आत्मा सदा आनंदरूप छे. अरेरे! एने खबर नथी के आत्माने विज्ञानघन भगवान कहीने बोलाव्यो छे. माता बाळकने पारणामां सुवाडे त्यारे तेनां वखाण करीने सुवाडे छे. ‘‘मारो दीकरो डाह्यो ने पाटले बेसी नाह्यो’’ एम प्रशंसा करीने सुवाडे छे. जो ठपकावे तो बाळक घोडियामां न सूवे. तेम अहीं त्रिलोकनाथ तीर्थंकरदेव अने वीतरागी संतो जगतना जीवोने जगाडवा ‘भगवान’ कहीने बोलावे छे. कहे छे-

अरे भगवान! तुं त्रणलोकनो नाथ छुं! आ रागद्वेषादि परिणाम छे ए तो पुद्गलना परिणाम छे, तारी चैतन्यजातिनी ए चीज नथी. आ व्यवहाररत्नत्रयना परिणाम जड, अचेतन पुद्गलना परिणाम छे. जेम शीत-उष्ण अवस्था जडनी साथे अभेद छे तेम व्यवहाररत्नत्रयना परिणाम जड पुद्गलनी साथे अभेद छे. सांभळीने लोको राड नाखी जाय छे! पण भाई! जे व्यवहाररत्नत्रयने तुं साधन माने छे तेने तो अहीं पुद्गलना परिणाम एटले जड-अचेतन कह्या छे. ते मोक्षमार्गनुं साधन केम होय?

अहो! श्री अमृतचंद्राचार्यदेवे शुं गजब काम कर्युं छे! आत्मा तो आत्माराम छे. ‘निजपद रमे सो राम कहीए.’ अतीन्द्रिय आनंदमां रमे ते आत्माराम छे. अने जे रागमां रमे ते अनात्मा हराम छे. रागमां रमे ते आत्मा-राम नथी, हराम छे. ७२मी गाथामां रागने अनात्मा जड कह्यो छे अने जीव-अजीव अधिकारमां दया, दान, व्रत आदि परिणामने अजीव कह्या छे.

अहीं पण ए ज कहे छे के-राग-द्वेष-सुख-दुःखादि पुद्गलपरिणामनी अवस्था पुद्गल साथे अभिन्नताना कारणे आत्माथी अत्यंत भिन्न छे. अहाहा! दया, दान अने व्यवहाररत्नत्रयना परिणाम पुद्गलथी अभिन्न छे अने आत्माथी अत्यंत भिन्न छे. बहु सूक्ष्म वात, भाई.

अरे! रळवा-कमावामां आ जिंदगी (व्यर्थ) चाली जाय छे भाई! कदाच पांच-पचास लाख मळी जशे, पण मूळ वस्तु (आत्मा) हाथ नहि आवे, भाई! आम ने आम तुं रखडीने मरी गयो (दुःखी थयो) छुं! आवी सूक्ष्म वात सांभळवा मांड मळी छे तो धीरजथी सांभळीने निर्णय कर. अहीं कहे छे के देव-गुरु-शास्त्रनी श्रद्धानो