Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-९२ ] [ १९ राग अने व्यवहाररत्नत्रयनो राग पुद्गलथी अभिन्न छे अने ताराथी भिन्न छे. शुद्ध चैतन्यना लक्षे जे आत्माना आनंदनो अनुभव थाय तेमां ते निमित्त हो, पण एनाथी अनुभवनी दशा थई नथी. शुं पुद्गलपरिणामथी चैतन्यनी दशा थाय? न थाय.

भगवाने नव तत्त्व कह्यां छे. ते बधां भिन्न भिन्न छे. आस्रव तत्त्व जीव तत्त्वथी भिन्न छे. जो एम न होय तो नव तत्त्व सिद्ध नहि थाय. पुण्य तत्त्व जो जीवनुं थई जाय तो बन्ने एक थई जाय. तो नव तत्त्व रहे नहि. भगवान आत्मा ज्ञायक तत्त्व छे. ते पुण्य तत्त्वरूप केम थाय?

पुण्य-पाप-सुख-दुःखादिनुं जे ज्ञान थाय ते ज्ञान आत्माथी अभिन्न छे अने पुण्य- पाप आदि भाव आत्माथी भिन्न छे. आत्मा स्वपरप्रकाशक ज्ञानरूपे पोताथी परिणमे छे. तेमां दया, दान आदि पुण्य-पापना भाव निमित्तमात्र छे. निमित्तनो अर्थ उपस्थिति छे. ज्ञान तो पोताथी थयुं छे, निमित्तथी नहि.

हवे कहे छे-‘ज्यारे अज्ञानने लीधे आत्मा ते राग-द्वेष सुख-दुःखादिनो अने तेना अनुभवनो परस्पर विशेष न जाणतो होय त्यारे एकपणाना अध्यासने लीधे, शीत-उष्णनी माफक (अर्थात् जेम शीत-उष्णरूपे आत्मा वडे परिणमवुं अशकय छे तेम), जेमना रूपे आत्मा वडे परिणमवुं अशकय छे एवां राग-द्वेष-सुख-दुःखादिरूपे अज्ञानात्मा वडे परिणमतो थको (अर्थात् परिणम्यो होवानुं मानतो थको), ज्ञाननुं अज्ञानत्व प्रगट करतो, पोते अज्ञानमय थयो थको, ‘‘आ हुं रागी छुं (अर्थात् आ हुं राग करुं छुं)’’ -इत्यादि विधिथी रागादि कर्मनो कर्ता प्रतिभासे छे.’

अज्ञानीने दया, दानना परिणाम अने आत्मानी एक्तानो अध्यास छे. तेथी ए बे वच्चेनी भिन्नतानुं एने भान नथी. पुण्य-पापना परिणाम माराथी भिन्न छे अने ते संबंधीनुं ज्ञान माराथी अभिन्न छे एवुं अज्ञानीने भान नथी. जेम शीत-उष्ण अवस्था आत्मा द्वारा करावी अशकय छे तेम राग-द्वेषादि अवस्था आत्मा द्वारा करावी अशकय छे. दया, दान आदि परिणामरूपे आत्मानुं परिणमवुं अशकय छे. अहाहा...! हुं जाणनार-जाणनार एक ज्ञायक छुं एवुं भान नहि राखतां दया-दान-पुण्य-पापरूपे अज्ञानात्मा वडे परिणमतो थको एटले ते-रूपे पोते परिणम्यो होवानुं मानतो, अज्ञानी थयो थको आ हुं दया-दान आदि करुं छुं इत्यादि भाव वडे रागादि कर्मनो अज्ञानी कर्ता प्रतिभासे छे.

भगवान आतमा ज्ञायकस्वभावी चैतन्यबिंब प्रभु छे. अने पुण्य-पापना भाव, मिथ्यात्वना भाव अचेतन जड छे. शुभाशुभभाव छे ते मलिन आस्रवभाव छे. ते विपरीतस्वभाववाळा अचेतन जड छे. ते शुभाशुभभावपणे आत्मानुं परिणमवुं अशकय छे. छठ्ठी गाथामां आवे छे के-ज्ञायक आत्मा शुभाशुभभावोना स्वभावे परिणमतो नथी.