२० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प जो शुभाशुभभावरूपे परिणमे तो पोते जड थई जाय; केमके शुभाशुभभाव अचेतन जड छे. जे राग छे ते पोताने जाणे नहि, परने जाणे नहि अने समीपवर्ती आत्माने पण जाणे नहि. राग बीजा द्वारा जणाय छे. तेथी रागने अचेतन जड कह्यो छे. तेथी आत्मा जे ज्ञायकभावरूप छे ते रागद्वेषना अचेतनभावपणे केम थाय?
आत्मा परनो कर्ता थाय अने ते परनुं कार्य करे ए वात तो कयांय रही गई. शरीर, मन, वाणीनी क्रिया अने जगतनी व्यवस्थानां काम आत्मा करे ए वात बाजुए रही. अहीं कहे छे के भगवान आत्मानुं दया, दान, व्रत, भक्ति आदि जे विकल्प थाय ते विकल्पपणे परिणमवुं अशकय छे. पुण्य-पापना जे भाव थाय छे ते अज्ञानभाव छे. एटले के पुण्यपापना भावमां ज्ञानभावनो अंश नथी. ते भाव चैतन्यनी विरुद्ध जातिना विजातीय, जड अने अचेतन छे. भगवान आत्मा ज्ञानस्वरूप छे. अने ज्ञाननुं ज्ञानपणे ज परिणमन थवुं जोईए अने ते ज वास्तविक छे. परंतु पोताना ज्ञायकस्वभावनी द्रष्टि नहि होवाथी मिथ्याद्रष्टि जीवने हुं रागद्वेषपणे, पुण्य-पापना भावपणे परिणमुं छुं एम भासे छे. आ प्रमाणे ज्ञाननुं अज्ञानत्व प्रगट करतो ते रागादि कर्मोनो कर्ता थाय छे. भगवान ज्ञायकनी द्रष्टिनो अभाव छे एवो मिथ्याद्रष्टि जीव हुं स्वयं रागी छुं, पुण्य-पापनो हुं कर्ता छुं, आ शुभाशुभ परिणाम हुं करुं छुं- एम मानतो ते रागादि कर्मोनो कर्ता प्रतिभासे छे.
आ सर्वज्ञ भगवाननी दिव्यध्वनिनो सार भगवान कुंदकुंदाचार्यदेवे आ शास्त्रमां भर्यो छे. तेनी अमृतचंद्राचार्यदेवे टीकामां विशेष स्पष्टता करी छे. आचार्यदेव कहे छे-भगवान! तुं प्रज्ञा ब्रह्म प्रभु छो. ज्ञान अने आनंद तारुं स्वरूप छे अने ते-रूपे परिणमवुं ए तारुं निजकार्य छे. जेम शीत-उष्णपणे परिणमवुं तारुं कार्य नथी तेम दया दानना रागपणे परिणमवुं ए तारुं कार्य नथी. प्रभु! तारी प्रभुतानी तने खबर नथी! ज्ञान अने आनंदरूपे परिणमवुं ए तारी प्रभुता छे. रागपणे परिणमवुं ए तारी प्रभुता नथी. रागपणे परिणमतां तो ज्ञाननुं अज्ञानत्व प्रगट थाय छे.
ज्ञानरसथी भरेलो भगवान ज्ञायक पोते ज्ञानपणे परिणमे एवी एनी शक्ति छे. व्यवहाररत्नत्रयना रागपणे परिणमे एवी एनी शक्ति नथी. व्यवहाररत्नत्रयना रागपणे ज्ञायक आत्मानुं परिणमवुं अशकय छे. परंतु अरे! आवा निज ज्ञायकभावनी रुचि छोडीने अज्ञानी रागरूपे (अज्ञानपणे) परिणमे छे! ज्ञानस्वरूपे परिणमवाने बदले रागरूपे परिणमे ते एनुं अज्ञानरूप परिणमन छे.
ज्ञानस्वरूपे आत्मा परिणमे तेने ज्ञानरूप परिणमन कहे छे अने रागरूपे परिणमे तेने अज्ञानरूप परिणमन कहे छे. अरे भाई! व्यवहाररत्नत्रयना रागरूपे तो ते अनंतवार परिणम्यो छे. छहढालामां आवे छे ने के-