समयसार गाथा-९२ ] [ २१
भाई! पंचमहाव्रतना परिणाम, र८ मूळगुणना परिणाम ते राग छे, विभाव छे, झेर छे. भगवान आत्मा अमृतनो सागर छे. अमृतस्वरूप आनंदनो नाथ एवो ते रागना झेरपणे केम थाय? परंतु अज्ञानी पोताना अमृतस्वरूप भगवान ज्ञायकनी द्रष्टि छोडीने पर्यायबुद्धि थईने हुं पुण्यपाप आदि भावोनो कर्ता छुं एम अज्ञानपणे माने छे.
त्रिकाळी ज्ञायकस्वरूपनी द्रष्टि थाय तो रागपणे हुं परिणमुं छुं एवी द्रष्टि रहे नहि. समकितीने ज्ञाताद्रष्टास्वभावनी द्रष्टिनुं परिणमन होय छे. तेने ए ज्ञानरूप परिणमन छे. ज्ञानभाव छोडीने ज्ञानी रागस्वभावे परिणमतो नथी केमके एनी द्रष्टि ज्ञायक उपर स्थिर थई छे. परंतु अज्ञानीनी नजर ज्ञायक उपर नथी तेथी पोते स्वभावथी ज्ञानस्वरूप होवा छतां ज्ञानपणे परिणमवाने बदले ज्ञाननुं अज्ञानत्व प्रगट करतो रागनो कर्ता थईने परिणमे छे. हुं पुण्यपाप आदि करुं छुं एम मानतो पुण्यपाप आदि भावपणे-अज्ञानपणे परिणमतो ते रागादिनो कर्ता थाय छे. अहो! अमृतचंद्राचार्यदेवे अलौकिक टीका करी छे. हुं ज्ञाता छुं एम द्रष्टि करी परिणमे ते ज्ञानपरिणमन छे, केमके एमां ज्ञाननु ज्ञानत्व प्रसिद्ध थाय छे; परंतु हुं रागी छुं एम मानी रागपणे परिणमे ते अज्ञान-परिणमन छे केमके एमां ज्ञाननुं अज्ञानत्व प्रसिद्ध थाय छे. अहो! गजब वात छे! आमां तो जैनदर्शननो सार भरी दीधो छे.
आ पैसा-बैसा तो बधुं थोथां छे. एनी पाछळ तो हेरान थई जवानुं छे. एम ने एम प्रभु! तुं चोरासीना अवतार करी हेरान थई रह्यो छुं. अहीं कहे छे के भगवान आत्मा एकलुं चैतन्यबिंब ज्ञायकभावथी भरपूर अंदर पडयो छे. ते ज्ञानपणे परिणमे, निविंकारपणे परिणमे एवी एनी शक्ति अने सामर्थ्य छे. परंतु आवा चिद्रूप-स्वरूपनी द्रष्टिनो अभाव होवाथी ते पर्यायद्रष्टि थईने जाणे शुभाशुभ राग ज पोतानुं स्वरूप छे एम मानतो थको शुभाशुभभावरूपे परिणमतो अज्ञानने प्रगट करे छे. अज्ञानी पोतानी पर्यायमां जे विकार थाय छे तेमां तद्रूप थई रच्योपच्यो रहे छे अने माने छे के हुं रागी छुं. आ प्रमाणे ते ज्ञाननुं अज्ञानत्व प्रगट करे छे. ‘ज्ञाननुं अज्ञानत्व’ -ए शब्दमां घणी गंभीरता छे. अहा! पोताना चैतन्यस्वरूपने छोडीने जे एकला रागपणे परिणमे छे ते ज्ञाननुं अज्ञानत्व प्रगट करतो रागनो कर्ता थाय छे. अहो! गाथा अलौकिक छे! रागमां ज्ञान नथी अने ज्ञामां राग नथी एवुं सूक्ष्म रहस्य गाथामां प्रगट करेलुं छे.
आ टीकानुं नाम आत्मख्याति छे. आत्मख्यातिमां श्री अमृतचंद्राचार्यदेवे अमृत भर्यां छे. आत्मख्याति एटले आत्मप्रसिद्धि. शुद्ध चैतन्यना लक्षे आत्मा प्रसिद्ध थाय छे.