Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प परंतु अज्ञानी पोताना चैतन्यस्वरूप भगवानने भूलीने परलक्षे रागनी-अज्ञाननी प्रसिद्धि करे छे अने तेथी ते रागनो कर्ता थाय छे.

आ परमात्मानी दिव्यध्वनिमां आवेली परम सत्य वात छे. बे चार मास शुद्ध चैतन्यनी वात पण सांभळे तोपण जीवने ऊंचां पुण्य बंधाई जाय छे अने ते पुण्यना उदयथी लक्ष्मी आदि सामग्री मळे छे. अहा! तो रागनुं लक्ष छोडी शुद्ध चैतन्यनी द्रष्टि करे एनी तो शी वात! ए तो न्याल थई जाय छे. एने तो जे वडे जन्म-मरणनो अंत आवे एवुं सम्यग्दर्शन प्रगट थाय छे. भाई! पुण्यना योगे बहारनी लक्ष्मी आदि मळे ए तो धूळ छे. तथा पुण्य अने एना फळने पोताना माने ए मिथ्यात्व छे. जीव तो शुद्ध चैतन्यस्वरूप छे, पण पुण्यपाप आदि अजीवने पोताना माने ते मिथ्याद्रष्टि छे. मिथ्याद्रष्टि जीव पोते अज्ञानी थयो थको ‘आ हुं रागी छुं’ इत्यादि विधिथी रागादि कर्मनो कर्ता प्रतिभासे छे. हुं रागी छुं एटले राग मारुं कर्तव्य छे अने हुं रागनो कर्ता छुं एम अज्ञानीने प्रतिभासे छे. ज्यां सुधी द्रष्टि राग उपर छे त्यां सुधी ते रागनो कर्ता छे अने त्यांसुधी मिथ्याद्रष्टि छे. आवो आ वीरनो मार्ग छे! आवे छे ने के-

‘‘वीरनो मारग छे वीरानो, ए कायरना नहि काम जो ने’’

भाई! रागथी धर्म माने ते कायर नपुंसक छे. आत्मामां वीर्य नामनो गुण छे. ए वीर्य गुण तो निर्मळ परिणति उत्पन्न करे तेवो छे. रागनी उत्पत्ति थाय ते वीर्यगुणनुं काम नहि. रागने उत्पन्न करनारी पर्यायने तो नपुंसक कहेवामां आवे छे. समयसार गाथा ३९मां आत्मानुं असाधारण लक्षण नहि जाणवाने लीधे अज्ञानीने नपुंसक कह्यो छे. तेम ज शुभरागनी रुचि करे, शुभरागनी रचना करे तेने पुण्यपाप अधिकारनी १प४मी गाथामां नामर्द एटले नपुंसक कह्यो छे. त्यां कह्युं छे के-‘‘दुरंत कर्मचक्रने पार उतरवानी नामर्दाईने लीधे...पोते स्थूळ लक्ष्यवाळा होईने समस्त कर्मकांडने मूळथी उखेडता नथी.’’ आवा जीवोने नामर्द, नपुंसक एटले हीजडा कह्या छे. पाठमां (टीकामां) ‘क्लीब’ शब्द छे.

आ प्रमाणे ज्ञानानंदस्वभावनी द्रष्टि छोडीने रागपणे परिणमतो अज्ञानी हुं रागी छुं अने आ रागने हुं करुं छुं एवी बुद्धि वडे रागनो कर्ता थाय छे.

* गाथा ९२ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘राग-द्वेष-सुख-दुःखादि अवस्था पुद्गलकर्मना उदयनो स्वाद छे; तेथी ते, शीत- उष्णपणानी माफक, पुद्गलकर्मथी अभिन्न छे. अने आत्माथी अत्यंत भिन्न छे. अज्ञानने लीधे आत्माने तेनुं भेदज्ञान नहि होवाथी ते एम जाणे छे के आ स्वाद मारो ज छे; कारण के ज्ञाननी स्वच्छताने लीधे रागद्वेषादिनो स्वाद, शीत-उष्णपणानी माफक ज्ञानमां प्रतिबिंबित थतां, जाणे के ज्ञान ज रागद्वेष थई गयुं होय एवुं अज्ञानीने भासे छे. तेथी ते एम