Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-९२ ] [ २३ माने छे के ‘‘हुं रागी छुं, हुं द्वेषी छुं, हुं क्रोधी छुं, हुं मानी छुं,’’ इत्यादि. आ रीते अज्ञानी जीव राग-द्वेषादिनो कर्ता थाय छे.’

राग-द्वेष, पुण्य-पापना भाव, सुख-दुःख आदि अवसथा-ए बधो पुद्गलकर्मना उदयनो स्वाद छे. ए आत्माना आनंदनो स्वाद नथी. शीतउष्णपणानी माफक ए परिणामो पुद्गलथी अभिन्न छे. भगवान ज्ञायकथी ते परिणाम अत्यंत भिन्न छे. दया, दान, व्रत आदिना परिणाम आत्माथी अत्यंत भिन्न छे. परंतु अज्ञानीने आवुं भेदज्ञान नथी. तेथी ते एम ज जाणे छे के आ स्वाद मारो ज छे. अज्ञानी माने छे के राग मारी चीज छे. अरे भाई! तारी चीज तो ज्ञायक छे. ज्ञायक मारी चीज छे एम मानवाने बदले राग मारी चीज छे एम माने छे ते अज्ञान छे, मिथ्यात्व छे.

ज्ञाननी स्वच्छताने लीधे राग-द्वेषादिनो स्वाद ज्ञानमां प्रतिबिंबित थाय छे. जेवो राग थाय एवुं ज्ञानमां जाणवामां आवे छे. त्यां जाणे के ज्ञान ज रागद्वेषरूप थई गयुं होय एम अज्ञानीने भासे छे. राग तो खरेखर ज्ञाननुं परज्ञेय छे. पण एम न मानतां हुं रागद्वेषपणे ज थई गयो छुं एम अज्ञानीने भासे छे. तेथी ते एम माने छे के हुं रागी छुं, हुं द्वेषी छुं, हुं क्रोधी छुं, हुं मानी छुं इत्यादि. आ रीते अज्ञानी जीव रागद्वेषादि कर्मोनो कर्ता थाय छे; पण पोताना ज्ञाताद्रष्टास्वभावनुं भान प्रगट करतो नथी.

[प्रवचन नं. १प७ (शेष), १प८ * दिनांकः १६-८-७६ अने १७-८-७६]