ज्ञानात्तु न कर्म प्रभवतीत्याह–
सो णाणमओ जीवो कम्माणमकारगो होदि।। ९३ ।।
स ज्ञानमयो जीवः कर्मणामकारको भवति।। ९३ ।।
ज्ञानथी कर्म उत्पन्न थतुं नथी एम हवे कहे छेः-
ए ज्ञानमय आत्मा अकारक कर्मनो एम ज बने. ९३.
गाथार्थः– [परम्] जे परने [आत्मानम्] पोतारूप [अकुर्वन्] करतो नथी [च] अने [आत्मानम् अपि] पोताने पण [परम्] पर [अकुर्वन्] करतो नथी [सः] ते [ज्ञानमयः जीवः] ज्ञानमय जीव [कर्मणाम्] कर्मोनो [अकारकः भवति] अकर्ता थाय छे अर्थात् कर्ता थतो नथी.
टीकाः– ज्ञानथी आ आत्मा परनो अने पोतानो परस्पर विशेष जाणतो होय त्यारे परने पोतारूप नहि करतो अने पोताने पर नहि करतो, पोते ज्ञानमय थयो थको, कर्मोनो अकर्ता प्रतिभासे छे. ते स्पष्टताथी समजाववामां आवे छेः-जेम शीत-उष्णनो अनुभव कराववामां समर्थ एवी शीत-उष्ण पुद्गलपरिणामनी अवस्था पुद्गलथी अभिन्नपणाने लीधे आत्माथी सदाय अत्यंत भिन्न छे अने तेना निमित्ते थतो ते प्रकारनो अनुभव आत्माथी अभिन्नपणाने लीधे पुद्गलथी सदाय अत्यंत भिन्न छे, तेवी रीते ते प्रकारनो अनुभव कराववामां समर्थ एवी रागद्वेषसुखदुःखादिरूप पुद्गलपरिणामनी अवस्था पुद्गलथी अभिन्नपणाने लीधे आत्माथी सदाय अत्यंत भिन्न छे अने तेना निमित्ते थतो ते प्रकारनो अनुभव आत्माथी अभिन्नपणाने लीधे पुद्गलथी सदाय अत्यंत भिन्न छे. ज्यारे ज्ञानने लीधे आत्मा ते रागद्वेषसुखदुःखादिनो अने तेना अनुभवनो परस्पर विशेष जाणतो होय त्यारे, तेओ एक नथी पण भिन्न छे एवा विवेकने लीधे, शीत-उष्णनी माफक (अर्थात् जेम शीत-उष्णरूपे आत्मा वडे परिणमवुं अशकय छे तेम), जेमना रूपे आत्मा वडे परिणमवुं अशकय छे एवां रागद्वेषसुखदुःखादिरूपे अज्ञानात्मा वडे जराय नहि परिणमतो थको, ज्ञाननुं ज्ञानत्व प्रगट करतो,