समयसार गाथा-९३ ] [ २प
पोते ज्ञानमय थयो थको, ‘आ हुं (रागने) जाणुं ज छुं, रागी तो पुद्गल छे (अर्थात् राग तो पुद्गल करे छे)’ इत्यादि विधिथी, ज्ञानथी विरुद्ध एवा समस्त रागादि कर्मनो अकर्ता प्रतिभासे छे.
भावार्थः– ज्यारे आत्मा रागद्वेषसुखदुःखादि अवस्थाने ज्ञानथी भिन्न जाणे अर्थात् ‘जेम शीत-उष्णपणुं पुद्गलनी अवस्था छे तेम रागद्वेषादि पण पुद्गलनी अवस्था छे’ एवुं भेदज्ञान थाय, त्यारे पोताने ज्ञाता जाणे अने रागादिरूप पुद्गलने जाणे. एम थतां, रागादिनो कर्ता आत्मा थतो नथी, ज्ञाता ज रहे छे.
ज्ञानथी कर्म उत्पन्न थतुं नथी एम हवे कहे छेः-
‘ज्ञानथी आ आत्मा परनो अने पोतानो परस्पर विशेष जाणतो होय त्यारे परने पोतारूप नहि करतो अने पोताने पर नहि करतो, पोते ज्ञानमय थयो थको कर्मोनो अकर्ता प्रतिभासे छे.’
सम्यग्दर्शन थतां हुं ज्ञानानंदस्वरूप भगवान चैतन्यमूर्ति आत्मा छुं अने अचेतन जड रागादि माराथी भिन्न छे एवुं भान थाय छे. दया-दाननो राग हो के पंचमहाव्रतनो राग हो- ए आस्रव छे, दुःखदायक छे; अने एनाथी भिन्न मारी चीज आनंददायक छे. आ प्रमाणे आत्मा अने परनुं अंतर जाणे ते पोते ज्ञानमय थयो थको कर्मोनो अकर्ता प्रतिभासे छे. भेदज्ञान थतां ज्ञानी रागने पोतारूप करतो नथी अने पोताने रागरूप करतो नथी. अहाहा...! त्रिकाळी ध्रुव चैतन्यस्वभावमय जाणनस्वभावमय वस्तु आत्मा छे. एनी द्रष्टि थतां धर्मी एम जाणे छे के हुं तो ज्ञानमय छुं, रागमय नथी. व्यवहाररत्नत्रयनो जे राग छे ते हुं नथी. ज्ञानीने व्यवहार होय छे खरो, पण ते व्यवहारने ज्ञानी स्वरूपथी भिन्न ज माने छे. हुं तो व्यवहारनो-रागनो जाणनार छुं एम ज्ञानी माने छे. ते ते समये थतो राग ज्ञानीने मात्र जाणेलो प्रयोजनवान छे. आ वस्तुस्थिति छे. अहो! वस्तुस्थितिने कहेनारी भगवान कुंदकुंददेवनी आ अलौकिक वाणी छे!
पोताना ज्ञानानंदस्वभावने रागथी भिन्न करीने जे ज्ञानमय थयो ते एम जाणे छे के हुं तो ज्ञायक-जाणनार छुं; विषयवासनानो राग हो, पण हुं तो तेनो जाणनार ज्ञानस्वरूप छुं. अहा! मारा ज्ञानमां राग नथी अने रागमां मारुं ज्ञान नथी. हुं तो ज्ञानस्वरूप छु अने राग अचेतन छे; आ शुद्ध चैतन्यमूर्ति भगवान अचेतन एवा रागमां