Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प केम होई शके? अने अचेतन राग शुद्ध चैतन्यमां केम होई शके? आ प्रमाणे भेदज्ञान थतां स्वयं ज्ञानमय थयो थको ते कर्मोनो अकर्ता थाय छे. अहीं ‘स्वयं’ नो अर्थ-कर्म खस्यां माटे ज्ञानमय थयो एम नहि, पण वस्तु अंदर चिदानंदघनस्वरूप पडी छे तेनो आश्रय करवाथी स्वयं ज्ञानमय थयो छे.

अहो! जैनदर्शन ए तो विश्वदर्शन छे अने ए ज विश्वने शरण छे. धर्मी एम माने छे के हुं तो स्वयं ज्ञानमय छुं. राग छे तो रागनुं ज्ञान थयुं छे एम नथी. ज्ञान ज्ञानथी पोताथी थयुं छे, एने कोई परनी अपेक्षा नथी. ज्ञानी स्वयं ज्ञानी थयो थको कर्मोनो अकर्ता प्रतिभासे छे. अहीं जड कर्मनी वात नथी. दया, दान, व्रत, भक्ति आदिना शुभभावनो ज्ञानी अकर्ता प्रतिभासे छे एम वात छे. समजाणुं कांई? ते स्पष्टताथी समजाववामां आवे छेः-

‘जेम शीत-उष्णनो अनुभव कराववामां समर्थ एवी शीत-उष्ण पुद्गलपरिणामनी अवस्था पुद्गलथी अभिन्नपणाने लीधे आत्माथी सदाय अत्यंत भिन्न छे अने तेना निमित्ते थतो ते प्रकारनो अनुभव आत्माथी अभिन्नपणाने लीधे पुद्गलथी सदाय अत्यंत भिन्न छे.’......

जुओ, शीत-उष्ण अवस्था ते पुद्गलना परिणाम छे. ते पुद्गलथी अभिन्न एटले एकमेक छे. ते कारणथी ते अवसथा आत्माथी सदाय अत्यंत भिन्न छे. शीत-उष्ण अवस्था अनुभव कराववामां समर्थ छे एटले के ते अवस्था ज्ञान करवामां निमित्त छे. तेना निमित्ते थतो ते प्रकारनो अनुभव एटले ते प्रकारनुं ज्ञान आत्माथी अभिन्न छे. शीत-उष्णनुं जे ज्ञान थयुं ते आत्माथी अभिन्न छे. मतलब के शीत-उष्णनुं ज्ञान थयुं ते पोताथी थयुं छे, शीत- उष्ण अवस्था छे माटे थयुं छे एम नथी. शीत-उष्णनुं जे ज्ञान थयुं ते शीत-उष्ण अवस्थाथी सदाय भिन्न छे.

भगवान आत्मा ठंडी अने उनी अवस्थानो अनुभव करवामां समर्थ छे. अनुभवनो अर्थ तेनुं ज्ञान करवामां समर्थ छे. शीत-उष्णनो आत्मा अनुभव करे ए तो अशकय छे जडनी अवस्थानो आत्मा केम अनुभव करे? ठंडी-गरम अवस्थानो अनुभव एटले ज्ञान आत्मा करे छे एम अर्थ छे. आत्मा पोते पोताथी शीत-उष्ण अवस्थानुं ज्ञान करे छे तेमां ते शीत-उष्ण अवस्था निमित्त छे. शीत-उष्ण अवस्था छे माटे ज्ञान थयुं एम नथी, ज्ञान तो पोताथी स्वतंत्र थयुं छे.

शीत-उष्णनुं अहीं जे ज्ञान थयुं ते ज्ञान पण सम्यग्ज्ञानीने यथार्थ होय छे. जेने स्वरूपग्राही ज्ञान थाय तेने शीत-उष्ण अवस्थानुं साचुं ज्ञान थाय छे. कळशटीकामां (कळश ६०मां) आ वात करी छे. जेने स्वरूपग्राही ज्ञान थाय तेने परसंबंधीनुं परप्रकाशक ज्ञान यथार्थ थाय छे.