Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-९३ ] [ २७

भाई! जन्ममरणनो अंत आवी जाय एवो आ अलौकिक मार्ग छे. जेम शीत-उष्णनुं ज्ञान आत्माथी अभिन्न छे अने पुद्गलथी सदाय अत्यंत भिन्न छे, ‘तेवी रीते ते प्रकारनो अनुभव कराववामां समर्थ एवी राग-द्वेष-सुख-दुःखादिरूप पुद्गलपरिणामनी अवस्था पुद्गलथी अभिन्नपणाने लीधे आत्माथी सदाय अत्यंत भिन्न छे अने तेना निमित्ते थतो ते प्रकारनो अनुभव आत्माथी अभिन्नपणाने लीधे पुद्गलथी सदाय अत्यंत भिन्न छे.’

जुओ, शुभाशुभ राग अने हरखशोकना परिणाम बधा पुद्गलना परिणाम छे. जेम शीत-उष्ण अवस्था अचेतन छे तेम रागद्वेष अने सुख-दुःखनी अवस्था पण अचेतन छे. ए रागद्वेष आदि अवस्था पुद्गलजन्य छे. ते अनुभव कराववामां समर्थ छे एटले के ते अवस्था ज्ञानमां निमित्त छे. जेवा राग-द्वेष अने जेवी सुखदुःखनी कल्पना छे एवुं ज्ञान थाय छे. ज्ञाननो स्वभाव छे के जेम होय तेम जाणे. दयादाननो विकल्प छे ते कर्मचेतना छे, अने हरखशोकना परिणाम छे ते कर्मफळचेतना छे. अहीं कहे छे के ए कर्मचेतना अने कर्मफळचेतना पुद्गलना परिणाम छे, अचेतन छे, ते पुद्गलपरिणाम पुद्गलथी अभिन्न छे अने आत्माथी सदाय अत्यंत भिन्न छे. बे वात करी छे; एक बाजु शुद्ध चैतन्यस्वभावमय आत्मा अने बीजी बाजु पुद्गल. दया, दान अने पंचमहाव्रतना परिणाम ते पुद्गलपरिणाम छे, केमके तेमां ज्ञाननो अंश नथी. अहीं तो रागथी भेदज्ञान कराव्युं छे.

ज्ञानमय आत्मा छे ते रागमय नथी, केमके राग अचेतन छे. राग थाय छे चेतननी पर्यायमां, पण निमित्तनी उपाधिपूर्वक राग थाय छे ते अपेक्षाथी रागने पुद्गल कह्यो छे. भगवान आत्मामां राग नथी अने आत्माना स्वभावना लक्षे राग उत्पन्न थतो नथी. आत्मामांथी तो ज्ञान अने आनंदनी उत्पत्ति थाय तेवी एनी शक्ति छे. तेथी रागने पुद्गलपरिणाम कह्या छे.

रागद्वेष अने हरखशोकना परिणामना निमित्ते ते प्रकारनो जे अनुभव एटले ते प्रकारनुं जे ज्ञान थाय छे ते आत्माथी अभिन्न छे. एटले जेवा रागद्वेष अने हरख-शोकना परिणाम थाय छे एवुं अहीं आत्मामां ज्ञान थाय छे. मतलब के ज्ञान ज्ञानथी पोताथी थाय छे तेमां ते ते रागद्वेषादि परिणाम निमित्त छे. ज्ञान ज्ञानमां एकाग्र थाय ते ज्ञानचेतना छे. ते ज्ञानचेतनामां आ रागादि परिणाम निमित्त छे. ते रागादि भाव पुद्गलथी अभिन्न होवाना कारणे जीवथी सदा अत्यंत भिन्न छे. राग आत्मानी चीज होय तो ते नीकळे कई रीते? जे चीज जीवमांथी नीकळी जाय ते चीज जीवनी नथी. माटे रागादि पुद्गलनी चीज छे.

पंचाध्यायीमां पुण्यपापना भावने आगंतुक कह्यो छे. जेम महेमान आवे छे अने चाल्या जाय छे तेम आत्मा जे चीज छे एमां आ रागद्वेषना भाव थाय